हाडौती-मेवाड़ यात्रा-वृतांत

“क्यों न अबकी बार हवाई जहाज से कहीं घूमने चला जाये”- खेतों के मेढ़ पर बैठे हमारे मुंह से सुंदर और रविंद्र के लिए निकला।

“हवाई जहाज से!”- सुंदर ने कहा - “नहीं यार, बहुत खर्चा हो जायेगा।”

हमने कहा कि यह तजुरबा भी कभी कर के देखना चाहिए। यकीन मानो कि पहली पहल हवाई यात्रा बडी उत्तेजना भरी होती है। इसका अपना ही एक अलग मजा है। पहला हवाई सफर अपने आप में हासिल-ए-मंजिल है। और कुछेक चिकनी-चुपड़ी लगाकर उन दोनों को शीशे में हमने उतार लिया। फिर शुरु हुई एक सस्ती सी उड़ान की तलाश। आजकल कितनी सुविधाएं हो गई हैं। बस इंटरनेट युक्त एक मोबाइल फोन आपके हाथ में हो तो कुछ भी जानकारी ढुंढ निकालना सरल है। दिल्ली से जयपुर किफ़ायती हवाई सफर के मुफीद निकला। एक सहस्र रुपये में टिकट मिल जा रही थी। इससे सस्ती हवाई यात्रा और क्या होगी? इससे दोगुनी रकम तो टैक्सी वाला मांग लेता। तो, दो दिन में टिकट बुक कर लेने का जिम्मा लेकर हम वहां से उठे।

औली फोटो गैलरी - औली में हिमालय के नजारे

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औली - एक मनोरम हिल स्टेशन

औली को भारत के सर्वोत्तम स्कीइंग स्थलों में से एक माना जाता है। यह उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में चमोली जिले में स्थित है। औली की समुद्र तल से उंचाई लगभग 3000 मीटर है। वास्तव में औली एक "बुग्याल" है, गढ़वाली में जिसका अर्थ है घास का मैदान। हिमालय की शानदार पर्वत-श्रृंखला की अनेकानेक चोटियों के स्पष्ट दर्शन और स्कीइंग के लिये औली के आदर्श ढलान पेशेवर और नौसिखिये स्कीयर्स को एक साथ रोमांचित करते हैं। तो चलिये चले चलते हैं उत्तराखंड में स्थित हरदिल अजीज़ औली की यात्रा पर, कुछ कदम मेरे साथ…

फूलों की घाटी, उत्तराखंड

बेनज़ीर कुदरती खूबसूरती, दुर्लभ हो चुकीं उच्च पर्वतीय वनस्पतियों व जीवों का ठिकाना और सरकारी उपेक्षा का शिकार एक ऐसा स्वर्ग जिसकी मिसाल पूरे हिमालय में और कहीं भी नहीं है। जी हां मित्रों, ये आगाज़ है मेरी फूलों की घाटी की यात्रा का। और मुझे पूरा यकीन है कि यह यात्रा-वृतांत आपको एक अलग ही दुनिया से रू-ब-रू करायेगा। वर्ष 2004 में फूलों की घाटी को युनेस्को की विश्व विरासत सूची में सम्मिलित करने हेतू नामांकित किया गया था और एक वर्ष बाद यानि वर्ष 2005 में इसे युनेस्को द्वारा विश्व विरासत स्थल घोषित कर दिया गया। अब यह घाटी भारत में मौजूद कुल 35 विश्व विरासत धरोहरों में से एक है। तो चलिये चले चलते हैं देवभूमि उत्तराखंड में स्थित फूलों की घाटी की यात्रा पर, कुछ कदम मेरे साथ…

अंगारों की आंच पर जन्नत : खतरे और मुश्किलात

जैसा कि मैनें यात्रा-वृतांत की शुरूआत में ही फूलों की घाटी को सरकारी उपेक्षा का शिकार बताया था। सरकार इस घाटी में घुसने के डेढ सौ रूपये प्रति यात्री लेती है। विदेशियों के लिये तो यह रकम चार गुनी अधिक है। कोई डॉक्यूमेंट्री या व्यवसायिक वीडियो फिल्माने का शुल्क दस हज़ार रूपये से एक लाख रूपये तक है। एक एंट्री तीन दिनों तक मान्य होती है। यानि सरकार ने इसे राजस्व कमाने का अच्छा साधन बना लिया है। इस पर सरकार कोई सुविधा यात्रियों को देती हो, ऐसा नज़र नहीं आता। किसी भौतिक सुविधा की बात तो भूल ही जाईये, मूलभूत सुविधायें तक नदारद हैं। घाटी में घुसते ही अनेक नालों का बहाव पगडंडी से होकर गुज़रता है। कुछ तो काफी बङे हैं, जैसे कि प्रियदर्शिनी नाला, जिन पर पुल के नाम पर बल्लियां डाल दी जाती हैं। अपनी जान जोखिम में डालकर ही इन्हें पार करना होता है। किसी मुश्किल घङी में साथ देने के लिये वन-विभाग का कोई कर्मचारी भी नहीं होता है। ये सही है कि घाटी के संरक्षण के लिये यहां रात को रूकना मना है लेकिन दिन में भी किसी आपात स्थिति में सिर छुपाने की कोई व्यवस्था नहीं है।