अंगारों की आंच पर जन्नत : खतरे और मुश्किलात

जैसा कि मैनें यात्रा-वृतांत की शुरूआत में ही फूलों की घाटी को सरकारी उपेक्षा का शिकार बताया था। सरकार इस घाटी में घुसने के डेढ सौ रूपये प्रति यात्री लेती है। विदेशियों के लिये तो यह रकम चार गुनी अधिक है। कोई डॉक्यूमेंट्री या व्यवसायिक वीडियो फिल्माने का शुल्क दस हज़ार रूपये से एक लाख रूपये तक है। एक एंट्री तीन दिनों तक मान्य होती है। यानि सरकार ने इसे राजस्व कमाने का अच्छा साधन बना लिया है। इस पर सरकार कोई सुविधा यात्रियों को देती हो, ऐसा नज़र नहीं आता। किसी भौतिक सुविधा की बात तो भूल ही जाईये, मूलभूत सुविधायें तक नदारद हैं। घाटी में घुसते ही अनेक नालों का बहाव पगडंडी से होकर गुज़रता है। कुछ तो काफी बङे हैं, जैसे कि प्रियदर्शिनी नाला, जिन पर पुल के नाम पर बल्लियां डाल दी जाती हैं। अपनी जान जोखिम में डालकर ही इन्हें पार करना होता है। किसी मुश्किल घङी में साथ देने के लिये वन-विभाग का कोई कर्मचारी भी नहीं होता है। ये सही है कि घाटी के संरक्षण के लिये यहां रात को रूकना मना है लेकिन दिन में भी किसी आपात स्थिति में सिर छुपाने की कोई व्यवस्था नहीं है।

मेघालय में नारी-सशक्तिकरण

नारी-उत्थान, स्त्री-शक्ति आदि बहुत से शब्द हैं जो किताबों, पत्र-पत्रिकाओं और अख़बारों की शोभा बढाते हैं। जनमानस, विशेषकर औरतों, को उद्दवेलित करने के लिऐ नेता लोग तो ऐसे शब्दों को अपनी जुबान पर धरे रखते हैं। बङे-बङे सेमिनार और सभाऐं आयोजित की जाती हैं स्त्री-शक्ति विषय पर। रटे-रटाये भाषण दोहराऐ जाते हैं, कुछ घिसे-पिटे उदाहरण भी दिये जाते हैं पर आखि़र में लजीज़ व्यंजनों का मजा लेकर कागज के नैपकिनों की तरह स्त्री-शक्ति को भी कूङेदान के हवाले करके चलते बनते हैं। कहा ये भी जाता है कि औरतों की समझदानी छोटी होती है। समाज-व्यवहार की बातों को औरत भला क्या जाने? वे घर में ही ठीक हैं और घर की चहारदीवारी के बाहर उनका कोई काम भी नहीं है। ऐसी स्थिति में घर और जेल में कोई अंतर नहीं रह जाता। पर चारदीवारियों की उस घुटन से मर्दवा को क्या फर्क, क्योंकि उन्हें तो दुनिया चलानी होती है। वही दुनिया जो उस नारी की कोख से ही जन्म लेती है और मर्द जिसे चलाने के ठेकेदार बने फिरते हैं। कट्टर इस्लामिक राष्ट्रों में तो औरतें किसी जरुरी काम से बाहर निकलें भी तो चोटी से पंजों तक का भारी लबादा ओढकर ही निकल पाती हैं। खुली हवा में सांस लेना तो जैसे उन अभागिनों को मयस्सर ही नहीं हैं। मर्द उस घुटन का अंदाजा तक नहीं लगा सकते जिसमें घुटते-घुटते इन बुरकाधारिनों की जिंदगी बीत जाती है। लगायें भी तो कैसे? शुरू से ही वे अपनी मांओं, बहनों और अन्यों को बेजान चीज़ की तरह ट्रीट होता देखकर बङे होते हैं और अंततः खुद भी जुल्मी बन जाते हैं। कोख की कैद से निकलते ही पीहर की कैद, फिर ससुराल की कैद और अंत में कब्र की कैद। जिंदगी शुरू होने से पहले शुरू होती है कैद और मरने के बाद भी पीछा नहीं छोङती।