औली फोटो गैलरी - औली में हिमालय के नजारे

औली फोटो गैलरी। औली में हिमालय के नजारे। औली स्की रि़ज़ार्ट पिक्चर्स। औली गोरसों बुग्याल फोटो यात्रा। उत्तराखंड फोटो गैलरी।

औली - एक मनोरम हिल स्टेशन

औली को भारत के सर्वोत्तम स्कीइंग स्थलों में से एक माना जाता है। यह उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में चमोली जिले में स्थित है। औली की समुद्र तल से उंचाई लगभग 3000 मीटर है। वास्तव में औली एक "बुग्याल" है, गढ़वाली में जिसका अर्थ है घास का मैदान। हिमालय की शानदार पर्वत-श्रृंखला की अनेकानेक चोटियों के स्पष्ट दर्शन और स्कीइंग के लिये औली के आदर्श ढलान पेशेवर और नौसिखिये स्कीयर्स को एक साथ रोमांचित करते हैं। तो चलिये चले चलते हैं उत्तराखंड में स्थित हरदिल अजीज़ औली की यात्रा पर, कुछ कदम मेरे साथ…

फूलों की घाटी, उत्तराखंड

बेनज़ीर कुदरती खूबसूरती, दुर्लभ हो चुकीं उच्च पर्वतीय वनस्पतियों व जीवों का ठिकाना और सरकारी उपेक्षा का शिकार एक ऐसा स्वर्ग जिसकी मिसाल पूरे हिमालय में और कहीं भी नहीं है। जी हां मित्रों, ये आगाज़ है मेरी फूलों की घाटी की यात्रा का। और मुझे पूरा यकीन है कि यह यात्रा-वृतांत आपको एक अलग ही दुनिया से रू-ब-रू करायेगा। वर्ष 2004 में फूलों की घाटी को युनेस्को की विश्व विरासत सूची में सम्मिलित करने हेतू नामांकित किया गया था और एक वर्ष बाद यानि वर्ष 2005 में इसे युनेस्को द्वारा विश्व विरासत स्थल घोषित कर दिया गया। अब यह घाटी भारत में मौजूद कुल 35 विश्व विरासत धरोहरों में से एक है। तो चलिये चले चलते हैं देवभूमि उत्तराखंड में स्थित फूलों की घाटी की यात्रा पर, कुछ कदम मेरे साथ…

खीरगंगा ट्रेक, कुल्लू, हिमाचल प्रदेश

2016 में पहली जनवरी से ही घुमक्कङी का आगाज़ कर डाला, जब औली-गोरसों बुग्याल जाना हुआ। फिर अगले ही महीने पंजाब का किला रायपुर स्पोर्टस फेस्टिवल देखा। मार्च में हरिद्वार, ऋषिकेश और मुनि की रेती घुम कर आया। मई के पहले ही दिन निकला तो नारकंडा के लिये था, मगर जा पहुँचा - खीरगंगा। तो जी औली-गोरसों की तरह खीरगंगा भी एक ग्रुप को ही लेकर जाना हुआ। हुआ यूँ कि अपने दो-तीन दोस्त कहीं घुमने जाना चाहते थे। मैं अक्सर कहीं न कहीं के लिये निकलता रहता ही हूँ सो उन्होंने मुझसे संपर्क कर लिया। फरमाईश आई कि किसी ठंडी, नज़दीकी और सस्ती जगह ले चलो जहां भीङ-भाङ भी ना हो। अब दिल्ली के आस-पास की ऐसी कुछ जगहों के विकल्प मैंने उन्हें दे दिये। भाई लोगों को नारकंडा जँच गया। कार अपने पास है ही, खाने-पीने और रात को रूकने के खर्चे के अनुमान लगा कर मैंने चट से एस्टीमेट भेज दिया। पट से उधर से कन्फर्मेशन आ गई। पहली मई की शाम को निकलना तय हो गया। तय दिन को अपने तीनों दोस्तों के ग्रुप को पिक किया और निकल पङे नेशनल हाईवे नंबर एक की ओर। करनाल से निकले ही थे कि एक बंधु कहने लगे कि नारकंडा तो देखा-सुना है, कहीं और ले चलो। मैंने कहा कि भाई ठहरी तो नारकंडा की थी, अब अचानक क्या हुआ? फिर अब रात-रात में कहां का प्रोग्राम बनायें? बोला कि कहीं का भी, पर नारकंडा नहीं। धीरे-धीरे उस्ताद ने बाकियों की वोट भी अपनी ओर कर ली। तो अपन ने कहा कि सीट को पीछे कर के लेट जाओ और सो जाओ आराम से। अब सुबह ही पता चलेगा कि कहां पहुँचेंगें। यारों को आराम से सुलाकर अपने दिमाग के घोङे दौङाने शुरू कर दिये। दो दिन का सीमित समय था, उसके बाद सभी को अपने कामों पर लौटना था। गाङी सङक पर चलती रही और दिमाग आसमान में उङता रहा। बीसियों जगहों के बारे में सोच डाला पर कहीं का फाईनल नहीं हुआ। सोचते सोचते जीरकपुर जा पहुँचे, पर कहीं भी पहुँचना फाईनल नहीं हुआ। फिर सोचा चंडीगढ पहुँचते हैं फिर देखते हैं। सिटी ब्यूटीफुल में इण्ट्री हुई भी नहीं थी कि अचानक दिमाग़ में आया - खीरगंगा। और दो मिनट भी नहीं लगे इस पर मोहर मारने में।

पिंजौर गार्डन (हिमाचल मोटरसाईकिल यात्रा, भाग-01)

फूलों की घाटी का कार्यक्रम रद्द हो जाने की वजह से मन बहुत दुःखी हो गया था। कई कोशिशें करने के बावजूद उत्तराखंड यात्रा बार-बार टल रही थी। इस बार तो ऐन मौके पर जाना रद्द हुआ, बैग तक आधे पैक हो गऐ थे और फिर से उत्तराखंड यात्रा टल गई। मैं खीज गया। तेरी ऐसी की तैसी। एक तू ही है क्या भारत में? उत्तराखंड, अब आऊंगा ही नहीं तेरे यहां। कहीं और चला जाऊंगा। पङा रह अपनी मरोङ में। फटाफट हिमाचल का प्रोग्राम बना डाला। हिमाचल की कई जगहें मेरी टारगेट-लिस्ट में शामिल थीं। शिपकी-ला, किब्बर, प्राचीन हिन्दुस्तान-तिब्बत रोड, एन.एच. 05, काज़ा आदि। कुछ बौद्ध मठों को भी साथ में देखने का कार्यक्रम बनाया और एक लंबी दूरी की मोटरसाईकिल यात्रा फिक्स हो गई।

यात्रा-प्रोग्राम

तय कार्यक्रम की एक झलक नीचे दिखा रहा हूँ।
पहला दिनः पिंजौर गार्डन देखते हुये शिमला तक और आगे प्राचीन हिन्दुस्तान-तिब्बत रोड से होते हुये रामपुर तक।
दूसरा दिनः कल्पा, रोघी देखते हुये सांगला घाटी और छितकुल तक।
तीसरा दिनः शिपकी-ला देखते हुये दुर्गमतम एन.एच. 05 से होते हुये गियू, नाको, धनकर और ताबो मठ घूमकर काजा तक।
चौथा दिनः किब्बर और कीह देखते हुये कुंजम पास, चंद्रा घाटी और रोहतांग पास से होते हुये मनाली तक।
पांचवा दिनः दिल्ली वापस।