मेवाड़ का गौरव — चित्तौड़गढ़

Chittorgarh Tourism

“गढ़ तो चित्तौड़गढ़, बाक़ी सब गढ़ैया”- राजपूताना में अगर यह कहावत मशहूर है तो ऐसे ही नहीं है। वाक़ई में चित्तौड़गढ़ का किला बहुत ही विशालकाय है। राष्ट्रीय राजमार्ग 27, जिसे कि अब पूर्व-पश्चिम गलियारे के नाम से जाना जाता है चूंकि यह असमी सिलचर को गुजराती पोरबंदर से जोड़ता है, पर थोड़ा सा हटकर गंभीरी नदी के किनारे चित्तौड़गढ़ आबाद है। पहाड़ी के शिर पर किला तो तलहटी में आधुनिक नगर श्वास लेता है। मेवाड़ की इस धरा से हमारा प्रथम परिचय को प्राइमरी की किताबों ही में हो गया था जब हमें महाराणा प्रताप और राणा सांगा की वीरता और मीराबाई की कृष्णभक्ति के पाठ पढ़ाये जाते थे। भारतीय इतिहास के और भी कितने ही किरदार यहां अपनी भूमिकाएं अदा कर संसार से विदा हो चुके हैं। तो चलिए चले चलते हैं इस गौरवमयी भूमि से साक्षात्कार करने कुछ कदम मेरे साथ…

राजस्थान की नकाबपोश खूबसूरती — मयनाल महादेव, मेनाल

Menal Tourism

अद्वितीय रुप से सुंदर और आश्चर्यजनक रुप से गुमशुदा "मयनाल महादेव मंदिर परिसर" को राजस्थान की नकाबपोश खूबसूरती की ही संज्ञा दी जा सकती है। यहां खजुराहो के मंदिरों का प्रतिबिंबन करते मंदिर हैं, राजा पृथ्वीराज का तफ़रीह करने का महल है, सवा-सौ फीट उंचाई से गिरने वाला जलप्रपात है महानालेश्वर शिव मंदिर है और कुछ अन्य मंदिर जैसे बालाजी आदि तो हैं ही हरियल घास के दो बड़े लॉन भी पिकनिक मनाने के वास्ते हैं। इतना सब होने पर भी दिन-भर में जरा-भर से लोग यहां आते हैं, इनमें भी स्थानीय ही बहुमत में होते हैं। यह जगह इतनी शांत और प्यारी है कि पूरा दिन भर यहां बिता दें तो भी दिल न भरे। मित्रगणों के साथ हों या गृहस्थी के साथ, किसी भी तरह मेनाल आपको निराश नहीं कर सकता। चित्तौड़गढ-कोटा हाईवे पर स्थित होने के बावजूद इस जगह का गुमनाम रहना हैरान करता है। साढे आठ सौ बरस के पुष्टता से ज्ञात इतिहास वाले इस कमछुऐ स्थान के सफर पर चलिए चले चलते हैं, कुछ कदम मेरे साथ…

हाड़ौती का ग़रूर — बूंदी (राजस्थान)

Bundi Tourism

अरावली पर्वत श्रृंखला के ऊपर स्थित, बुंदी के किले से सफेद और नीले पुतित घरों का एक विशाल विस्तार दिखता है। उन बिखरे हुए से भवनों में कुछ बडी पुरानी हवेलियां हैं जो क्षेत्र की समृद्ध विरासत से आगंतुक को अवगत करातीं हैं। बूंदी शहर तीन तरफा अरावली से घिरा पहाड़ियों के कंठ मध्य बसा हुआ जान पड़ता है। यह उठती-उतरती संकरी गलियों वाला नगर है। चौगान गेट के पास बहुधा परिस्थिति ऐसी हो जातीं है कि किसी चौपहिया वाहन के पास निकलने का कोई मार्ग नहीं होता। इन संकरी गलियों में खुलते मकानों, दुकानों और दालानों के दरवाजे़ आमतौर पर उंची सीढ़ियों वाले होते हैं। चौगान गेट की लगती बाज़ार बहुत बड़ी तो नहीं, किंतु हां, रंग-बिरंगे सामानों से युक्त जरुर है। मसाले, रंगीन लिबास, फल और दूसरी कितनी ही चीजें बिक्री के लिए वहां सजी धरी रहती हैं। बूंदी अपने सुशोभित क़िलों, महलों और बावड़ियों के लिए विदेश में बडा प्रसिद्ध है। जी हां, इस खूबसूरत नक्श के देसी कद्रदान कम ही हैं। कितने ही मंदिर भी इस नगर में शोभायमान हैं। वृहद इतिहास वाले इस कमछुऐ नगर के सफर पर चलिए चले चलते हैं, कुछ कदम मेरे साथ…

हुमायूं का मकबरा, बिल्कुल अलग अदांज में।

वो खाता रहा ठोकरें, जिंदगी भर सुकूं को।
ना मिल सका सुकूं, मौत के बाद भी रूह को।।

द्वितीय मुगल बादशाह “नासिरूद्दीन मुहम्मद हुमायूं” पर ये पंक्तियां सटीक बैठती हैं। इतिहास में बहुत से शासकों का जीवन लङाईयों में बीता है पर इस शासक का जीवन लङाईयों के साथ-साथ बेहद लंबे सफरों में भी बीता। काबुल में जन्म के बाद हुमायूं हजारों किलोमीटरों दूर दिल्ली आया। 23 साल की उम्र में पिता बाबर का साया सिर से उठ जाने के बाद 1531 में हुमायूं को गद्दी संभालनी पङी। नौ वर्षों तक शासन किया लेकिन 1540 में जब शेरशाह सूरी के हाथों मात खानी पङी तो फिर से सफर का जो सिलसिला शुरू हुआ तो लगातार पंद्रह सालों तक चलता रहा। वो दिल्ली से अफगानिस्तान होता हुआ फारस गया। वर्षों तक सेना और सहयोगी इकठ्ठे करता रहा ताकि फिर से अपना राज पा सके। जब लौटा तो उसके साथ थी कुलीन फारसी सेवकवृंदों और लङाकों की पूरी फौज। फारस में बिताऐ गऐ वे पंद्रह वर्ष न केवल हुमायूं के जिंदगी में बल्कि उसकी मौत के बाद बनने वाले मकबरे के लिऐ भी अति महत्वपूर्ण सिद्ध हुऐ। फारसी संस्कृति का असर हुमायूं और उसके बाद के काल के हिंदुस्तान पर साफ-साफ दिखता भी है। दर-दर की ठोकरें खाऐ इस शंहशाह ने दिल्ली लौट कर राज की बाजी तो जीत ली पर केवल साल-भर ही हुकूमत कर पाया। 1556 में सीढीयों से गिरकर हुमायूं की मौत हो गई। उसे दिल्ली में पुराना किला में दफनाया गया। सफर के जिन्न ने मरहूम बादशाह का पीछा मरने के बाद भी नहीं छोङा। हेमू ने जब दिल्ली पर हमला किया तो मुगलों के पैर उखङ गऐ और भागती हुई मुगल सेना को हुमायूं का शव वापस खोद निकालना पङा। उन्हें डर था कि कहीं हेमू उसे नेस्तनाबूद ना कर दे। शव को सरहिंद ले जाकर दफन किया गया। सफर यहीं नहीं रूका। हुमायूं के हरम की एक बेगम थी- हमीदा। हमीदा बेगम का हुमायूं की जिंदगी में वही स्थान था जो उसके परपोते शाहजहां की जिंदगी में मुमताज बेगम का रहा। हमीदा बेगम फारस के वनवास के पहले, दौरान और बाद में उसी तरह हुमायूं के साथ रही थी जैसे मुमताज जंगों और सफरों के दौरान शाहजहां के साथ। फर्क बस इतना है कि शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज की कब्र के लिऐ ताजमहल का निर्माण* कराया तो हमीदा ने अपने शौहर हुमायूं के लिऐ उसी ताज के प्रेरक मकबरे का। हां बाद में इन दोनों को ही उनके शरीक-ए-हय़ात के साथ ही दफन किया गया। हमीदा की मुहब्बत का ही असर रहा कि हुमायूं को पंजाब की एक गुमनाम-सी जगह के हवाले नहीं छोङ दिया गया बल्कि दिल्ली में उसके लिऐ एक आलीशान मकबरे का निर्माण कराया गया। हेरात से विशेष कारीगर बुलाये गये इसे गढने के वास्ते। 1556 में मौत के बाद इस आखिरी और भव्य ठिकाने पर आते-आते हुमायूं को करीब दस साल लग गऐ। उसे तीन बार अलग-अलग जगहों पर दफनाया गया।

कहीं और कभी देखी है लाश की ऐसी खानाबदोशी। इसी बात पर उपर दो पंक्तियां लिखनी पङीं।

भूतो का गढ - भानगढ | राजस्थान मोटरसाईकिल यात्रा

इस कङी में पढिऐ राजस्थान के भुतहा समझे जाने वाले भानगढ किले का यात्रा-वृतांत

18 जुलाई 2015 यानि शनिवार के दिन मैं, सुंदर और कल्लू बारिश में भीगते हुऐ खेतों की ओर निकल गऐ। कुछ देर इधर-उधर की बातें हुईं। फिर मैं कहने लगा कि यार पंजों में बङी बेचैनी महसुस हो रही है। बहुत दिनों से कहीं घुमने का कार्यक्रम नहीं बना है। चलो कहीं चलते हैं। हालांकि सुंदर जुन में ही पत्नी और बच्चों के साथ मसूरी घूम कर आया था। अब फिर से कहीं चलने की बात उठी तो पठ्ठा फटाक से फिर तैयार हो गया। कल्लू की हमेशा से आदत रही है कि जब भी कहीं घुमने चलने की बात होती है तो बंदा ऐसे रिएक्ट करता है जैसे केवल घुमक्कङी के लिऐ ही उसका जन्म हुआ है। कहता है – अरै यार, ये भी कोई पुछने की बात है। कभी भी चलो। हालांकि इस कभी भी चलने का मतलब होता है कि कभी भी मत चलो। एक बार जोश से भर जाने के बाद जल्द ही उसकी हवा निकल जाती है और जैसे-जैसे वक्त नजदीक आने लगता है, टालमटोल के उसके नऐ-नऐ बहाने निकलने लगते हैं। कल्लू महाराज पक्के सरकारी नौकर हैं। नौकरी पर कम ही जाते हैं। लेकिन जब हम कहीं घुमने का कार्यक्रम बना रहे हों तब तो उन्हें नौकरी पर जाना ही जाना होता है, अन्यथा देश की व्यवसथा खतरे में पङ सकती है। सुंदर की छुट्टी मंगलवार की होती है। उसकी ड्यूटी का कुछ ऐसा चल रहा है कि इसी एक दिन से ज्यादा छुट्टी वो कर नहीं सकता। उसका ड्यूटी-टाईम है दोपहर एक बजे से रात दस बजे तक। मैं मोटरसाईकिल से जाना चाहता था और नाईट-ड्राईविंग भी नहीं करना चाहता था। तो इस प्रकार हमारे पास मंगलवार (21-07-2015) का पुरा दिन और बुधवार का आधा दिन था। बुधवार दोपहर तक हर हाल में सुंदर को ड्यूटी पर पहुँचना था।