प्रथम स्वछंद यात्रा — साईकिल पर

प्रथम परवाज़ के यह कुछ क्षण हैं जिन्हें-हमारा तो कहना ही क्या है-पाठकगण भी यात्रा-वृतांत की समाप्ति के उपरांत भुला नहीं सकेंगे। चलिये चल पड़िऐ कुछ कदम मेरे साथ, एक ऐसे सफर पर जो अब से सोलह बरस पुराना है मगर ताज़गी जैसे कल ही की लिऐ हुऐ है। एक नवतरुण की पहली उड़ान का सफ़र, पहले दुस्साहस की बात और घुमक्कड़ी को आहुत घर से निकल भागने की कहानी…

हाडौती-मेवाड़ यात्रा-वृतांत

“क्यों न अबकी बार हवाई जहाज से कहीं घूमने चला जाये”- खेतों के मेढ़ पर बैठे हमारे मुंह से सुंदर और रविंद्र के लिए निकला।

“हवाई जहाज से!”- सुंदर ने कहा - “नहीं यार, बहुत खर्चा हो जायेगा।”

हमने कहा कि यह तजुरबा भी कभी कर के देखना चाहिए। यकीन मानो कि पहली पहल हवाई यात्रा बडी उत्तेजना भरी होती है। इसका अपना ही एक अलग मजा है। पहला हवाई सफर अपने आप में हासिल-ए-मंजिल है। और कुछेक चिकनी-चुपड़ी लगाकर उन दोनों को शीशे में हमने उतार लिया। फिर शुरु हुई एक सस्ती सी उड़ान की तलाश। आजकल कितनी सुविधाएं हो गई हैं। बस इंटरनेट युक्त एक मोबाइल फोन आपके हाथ में हो तो कुछ भी जानकारी ढुंढ निकालना सरल है। दिल्ली से जयपुर किफ़ायती हवाई सफर के मुफीद निकला। एक सहस्र रुपये में टिकट मिल जा रही थी। इससे सस्ती हवाई यात्रा और क्या होगी? इससे दोगुनी रकम तो टैक्सी वाला मांग लेता। तो, दो दिन में टिकट बुक कर लेने का जिम्मा लेकर हम वहां से उठे।

फूलों की घाटी, उत्तराखंड

बेनज़ीर कुदरती खूबसूरती, दुर्लभ हो चुकीं उच्च पर्वतीय वनस्पतियों व जीवों का ठिकाना और सरकारी उपेक्षा का शिकार एक ऐसा स्वर्ग जिसकी मिसाल पूरे हिमालय में और कहीं भी नहीं है। जी हां मित्रों, ये आगाज़ है मेरी फूलों की घाटी की यात्रा का। और मुझे पूरा यकीन है कि यह यात्रा-वृतांत आपको एक अलग ही दुनिया से रू-ब-रू करायेगा। वर्ष 2004 में फूलों की घाटी को युनेस्को की विश्व विरासत सूची में सम्मिलित करने हेतू नामांकित किया गया था और एक वर्ष बाद यानि वर्ष 2005 में इसे युनेस्को द्वारा विश्व विरासत स्थल घोषित कर दिया गया। अब यह घाटी भारत में मौजूद कुल 35 विश्व विरासत धरोहरों में से एक है। तो चलिये चले चलते हैं देवभूमि उत्तराखंड में स्थित फूलों की घाटी की यात्रा पर, कुछ कदम मेरे साथ…

उत्तराखंड मोटरसाईकिल यात्रा 2013

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उत्तराखंड मोटरसाईकिल यात्रा (दूसरा दिन)
कल उत्तराखंड की अपनी शुरूआत ही बारिश में की थी। बारिश भी ऐसी कि सुबह चार बजे बहादुरगढ से निकले हुऐ हम मोटरसाईकिल सवार 260 किलोमीटर दूर हरिद्वार तक एक दिन में भी नहीं पहुँच सके। दो किलोमीटर पहले ज्वालापुर में ही रूकना पङा। आज सवेरे जब छः बजे उठे तब भी बारिश जारी थी। मैं 16 जनवरी 2015 का सवेरा देख रहा था। इस बात से बिल्कुल बेखबर कि आज पहाङ पर मुसीबतों का पहाङ टुटने वाला है। वैसे तो उत्तराखंड में पिछले कुछ दिनों से लगातार ही बारिश हो रही थी पर आज सैलाब आने वाला था। आठ बजे तक मैं अपने नित्य कार्यों से निपट चुका था। सुँदर और कल्लू को भी जगा दिया कि वे भी निपट लें ताकि जैसे ही मौका मिले, आगे पहाङ के सफर पर निकल पङें। नौ बजे तक हम रेडी-टू-गो हो गऐ। लेकिन वर्षा रूकने के कोई आसार नहीं। धर्मशाला वालों से इस बात की भनक हमें मिल चुकी थी कि ऊपर पहाङों पर भी लगातार जबरदस्त बारिश चल रही है। एक बार यह भी विचार आया कि अबकी बार उत्तराखंड यात्रा रद्द कर देते हैं और घर लौट चलते हैं। विचार-विमर्श चल ही रहा था कि मूसलाधार बारिश चमत्कारी ढंग से रूक गई। बादल छँटे तो नहीं थे पर पानी की एक बूँद तक नहीं गिर रही थी। मैं आगे जाना चाहता था। साथी भी पीछे नहीं हटे। धर्मशाला वालों को पचहतर रूपऐ दिये और मोटरसाईकिल स्टार्ट कर आगे बढ चले। सङक पर आते ही भंयकर रूप से हुई बारिश का परिणाम देखने को मिल रहा था। जगह-जगह पानी भरा हुआ था। ज्वालापुर में स्वामी श्रृद्धानंद चौक के पास उपरी गंग नहर पर एक पुल है। इस पुल के पास वाले घाट पर एक छोटा सा मंदिर है। यह मंदिर गंग नहर में आधे से ज्यादा डूब चुका था। केवल ऊपरी भाग में शेषनाग का फन ही नजर आ रहा था। आगे बढे। बूंदाबांदी फिर शुरू हो गई। हरिद्वार में गंगा तट पर शोभायमान ऊंची शिव प्रतिमा के पास वाले पुल से गंगा को देखा। समुंद्र जैसी विशाल लहरें। एक मोटरसाईकिल के अवशेष भी देखे जिसे गंगा पता नहीं कहां से बहा लाई थी और यहां किनारे पर पटक दिया था। हर की पौङी की तरफ का जायजा भी लिया गया। पानी वाल्मिकी मंदिर में घुसने को उतावला था। धारा के ठीक बीच में विराजित देवी की प्रतिमा का भी कोई नामोनिशान नहीं था। गंगा का वैसा रौद्र रुप आज तक हरिद्वार में मैंने तो इससे पहले नहीं देखा था। हर की पौङी की सीढीयां डूब रही थीं और जीवनदायिनी मां आज चंडी का रूप धारण किये हुऐ थी।

उत्तराखंड मोटरसाईकिल यात्रा 2013 - एक बाईक ट्रिप बारिश में

कौन भूल सकता है उस तबाही को, जो 2013 में उत्तराखंड ने देखी थी। विनाश के उस सागर के तट पर उन दिनों मैं भी तो था। गंगा का वैसा रौद्र रुप आज तक हरिद्वार में मैंने तो इससे पहले नहीं देखा था। हर की पौङी की सीढीयां डूब रही थीं और गंगा के ठीक बीच में विराजित देवी की प्रतिमा का कोई नामोनिशान नहीं था।

तो दोस्तों, आपको ले चलता हुँ 2013 के उन्हीं विनाशकारी दिनों में मोटरसाईकिल से की गई अपनी हिमालय यात्रा पर।

शिमला यात्रा - दिल्ली से शिमला (प्रथम दिन)

हिमालय भारत का ताज है। ताज क्या राजा है राजा। जैसे राजाओं की कई-कई रानियां होती हैं, वैसे ही हिमालय के पहाङों की भी कई रानियां हैं। जैसे- मसूरी, शिमला आदि आदि आदि। तो जी 2012 के सितंबर माह में जब पहाङों की रानी शिमला का कार्यक्रम बन गया। सोचा वाहन भी कुछ राजसी झलक वाला होना चाहिऐ। अब मैं ठहरा बोद्दे हिसाब-किताब का माणस। जहाज में तो जा ना सकता। हिमालयन क्वीन का आरक्षण करा डाला। धुर शिमला तक कन्फर्म बर्थ भी मिल गई। हो गऐ शाही ठाठ। आराम से पैर पसार कर सफ़र करेंगें। ट्रेन का अंदाज़ राजसी ना सही, नाम तो है। अब महाराज हिमालय की रानी शिमला तक रानी ट्रेन से यात्रा करेंगें।