प्रथम स्वछंद (साईकिल) यात्रा — भाग 'आठ'

सितंबर 15, 2002 (दसवां दिन)

सितंबर 15, 2002 की सुबह हम गढ-मिरकपुर गांव के एक ढाबे पर सोये पड़े थे जब चिड़ियों की चीं-चीं से आंखें खुलीं। रात बढिया कटी। मच्छर नहीं आऐ और 'बादशाह' भी देखने को मिली। सुबह हम मुंह धोकर और शायद चाय भी पीकर निकल लिए। बहालगढ पहुंचे, और वहां से नरेला। जब नरेला से निकलने वाले थे तो राह भटक गये। नरेला से बवाना लौटने में रेल-फाटक से थोड़ा पहले सड़क दो भागों में Y रूप में फटती थी। यह अब भी यथास्थिति ही में है। बवाना के लिए इस पर दायें मुड़ना होता है किंतु हम बायें हो लिऐ। कुछ पीछे यह अनुभव तो हो गया कि गलत सड़क पर चढ़ आये हैं पर फिर भी चलते रहे, यह सोच कर कि कहीं न कहीं तो निकलेंगे ही। किंतु हम किसी तिलिस्म में जैसे उलझे गये कि आसानी से राह ही न मिली। न जाने किन अनदेखे गांवों और खेतों से होकर कहाँ निकले। एक जगह रुककर-पता नहीं कहाँ-हम नहाये और कपड़े भी धोये। वह कोई औद्यौगिक क्षेत्र जान पड़ता था और सरकारी सप्लाई का ढेरों पानी वहां रिस रहा था। नहा-धो कर और कपड़े सूख जाने पर हम चले। किसी तरह पूछताछ करते-भटकते हम कंझावला के चौक पर पहुंच गये। वहां से बायें मुड़ कर घेवरा तक पहुंच गये। घेवरा में रोहतक-दिल्ली रोड़ मिल जाता है जो दायें हरियाणा में ले जाता है किंतु किसी चुंबकाकर्षण के वशीभूत लोहे की साइकिलें स्वत: ही दिल्ली की ओर मुड़ गईं। तब का दिल्ली भ्रमण आज भी एक मुअम्मा ही बना हुआ है कि बगैर बात हम उधर गये क्यों? यदि वास्तव में हमें दिल्ली ही में घुसना था तो जी.टी रोड़ से ही क्यों न घुसे। पूरा तो ध्यान नहीं पडता मगर हां उस रोज रात हुए हम मंगोलपुरी के किसी इलाके में थे जहाँ यहां-वहां रेहडियों पर मुर्गों के गोश्त टंगे हुए थे। शुरु ही से मैं, और सुंदर भी, दृढ़ शाकाहारी हैं तो नाक-भौं सिकोड़ कर वहां से भाग निकले। किधर से निकले, नहीं मालूम। कहां पहुँचे, नहीं मालूम। जानने की कोशिश भी नहीं की। सडकों पर भटकते हुए आधी रात हुई और जान जवाब देने लगी तो एक पार्क में जा बैठे। थके शरीर ने खुद-ब-खुद स्वयं को जमीन के समानांतर कर लिया। आंखें बोझिल हो आईं। उस दशा में वह हुआ जो न चाहते हुए भी यायावरों को झेलना-औटना पडता ही है। मच्छरों का जबरदस्त हमला। ऐसा जान पडा जैसे सारी दिल्ली के मच्छरों को हमारे ही उपर छोड़ दिया हो। उन रक्त-पिपासुओं का आकार भी किसी मक्खी से कम क्या रहा होगा। तभी कुछ देर बाद ही एक बाशिंदा आया। नजदीक आकर हमें हडकाना चालू कर दिया कि भाग जाओ यहां से। क्या भगवान के दरबार में चोरी करने आये हो? असल में उस पार्क में किसी जागरण-कीर्तन मंडली ने टैंट सजाया हुआ था। और आने वाले भक्त ने सोचा कि हम कोई उचक्के हैं और उनके सामान पर डाका डालने आये हैं। जिरहबाजी के बाद हम वहीं सोये या कहीं और गये इसका ध्यान नहीं पडता।

प्रथम स्वछंद (साईकिल) यात्रा — भाग 'सात'

सितंबर 13, 2002 (आठवां दिन)

अगले रोज यानि तारीख़ को न जाने हमने कौन रास्ता पकड़ लिया कि कहाँ से निकले सो कुछ याद नहीं। सुबह को कुछ घंटे रुकी झमाझम बारिश बाद में बदस्तूर जारी रही। रात भर की बेचैनी अगले रोज़ दिन में इस कदर हावी हो गई कि चलना नामुमकिन सा लगने लगा। फिर भी पूरे दिन में दो तीन मील तो चले ही। इस दिन की अधिक स्मृतियाँ अब स्मरण-कोष में उपस्थित नहीं हैं। याद पडता है कि सांझ ढले हम मंडावली गांव में खडे़ हुए भीग रहे थे। वहां हलके अंधेरे में खडे खडे हम इधर उधर देख रहे थे। उस अवस्था में एक आदमी ने वहां हमें देख लिया और अपने घर ले गया। बाद में पता चला कि वह एक जाट था और मंडावली का सरपंच था। अधिक कुछ याद नहीं है, हां परंतु हमें सड़क से थोडा़ हटकर एक कमरे में ठहराया गया था। कदाचित् वह कमरा आगंतुकों के निमित्त बैठक के रूप में बनाया गया था। अच्छा भोजन भी मिला, सोने को अच्छा बिस्तर भी मिला। दाहा के बाद यह दूसरा मौका हुआ कि जब हमें किसी के घर में पनाह मिली। न केवल रात भले से कटी बल्कि भोजन और बिस्तर भी मिला।

प्रथम स्वछंद (साईकिल) यात्रा — भाग 'छह'

सितंबर 11, 2002 (छठवां दिन)

कल हम सोच कर आये थे कि कम से कम एक दिन और मजदूरी का काम कर सकते हैं जिससे रुपयों का कुछ अधिक इंतजाम हो जाय। लेकिन जल्द ही हमें अनुभव हुआ कि इस तरह से यायावरी की यात्राऐं नहीं कीं जा सकतीं। हम जितना भी कमायेंगे रोज उसका आधे सेे अधिक खर्च भी कर देंगे। हमें कोई दूसरा ही काम खोजना होगा। इसलिए अपना हिसाब कर लेने के लिए हम ठेकेदार के यहां पहुंच गये। ठेकेदार आज भी नहीं आया था। हमें बताया गया कि शायद आज वो देर से आये या यह भी हो सकता है कि आये ही ना।
“यह तो भारी गङबङ हो गई। अब क्या करें?”
“ हां। इंतज़ार भी नहीं कर सकते। वरना तो हम फिर वहीं एक दिन पीछे आ जायेंगे।”
“तो क्या और एक दिन काम करें?”
“नहीं। चल मुंशी के पास चलते हैं।”

प्रथम स्वछंद (साईकिल) यात्रा — भाग 'पाँच'

सितंबर 10, 2002 (पांचवा दिन)

अगले दिन नौ बजे तक हम ठेकेदार के यहां पहुंचे। देखा कि पहले ही कुछ बिहारी मजदूर उस रेत को ढोने में लगे पङे हैं। ठेकेदार आया नहीं था। मुंशी से पूछा कि भाई ये क्या माजरा है? इस रेत को ढोने का सौदा तो हम कल ही कर गये थे जबकि अब ये लोग इस काम को कर रहे हैं। जवाब मिला कि ये लोग पहले से ही इस काम का सौदा कर चुके थे। कल आ न सके थे, इसलिए तुम्हें मिल गया होगा, पर अब यही इसे करेंगे। वो देखो, वो पांच हैं और तुम केवल दो।
“तो अब हम क्या करें?”
“अगर तुम्हें काम करना ही है तो ईंट ढो लो। यहां नीचे से उपर तीसरी मंजिल पर पहुंचानीं हैं।”

प्रथम स्वछंद (साईकिल) यात्रा — भाग 'चार'

सितंबर 09, 2002 (चौथा दिन)

सुबह चार बजे जबकि हम कह सकते थे कि हां, हमने सफलतापूर्वक रात काट ली है, बस घंटे भर की बात थी और जैसे ही आंखों को रोशनी महसूस हुई हमने खुद को एक-दूसरे को देखते हुए पाया। थोड़े समय बाद पंडित आया और ताला खोल गया, साथ ही जल्दी निकल जाने की ताकीद भी कर गया। हम बाहर निकल कर कुछ देर इधर-उधर टहलते रहे, यूं ही। पास के खेतों में ज्वारें थीं। फिर उनमें अंतर्ध्यान होकर जो करना था किया और चाय के खोमचे की ओर लौटे। आज किसी भी तरह प्रथम चरण को खत्म करने-यानि हरिद्वार पहुँचने- का संकल्प लिया जा चुका था। हाथ-मुंह धोते ही हम अपनी अपनी काठियों पर सवार थे।

प्रथम स्वछंद (साईकिल) यात्रा — भाग 'तीन'

सितंबर 08, 2002 (तीसरा दिन)

रात जो काढ़ा पीया था उसने जिलवा दिया। सवेरे उठे तो हम वो न थे, जो कल थे। यद्दपि उस चमत्कारिक देसी दवा का नुस्खा हमने पूछी थी पीछे जिस पर भूल पड़ गयी। शहद, हल्दी और तुलसी भर ही घटक याद रहे। सवेरे के नाश्ते में देसी घी के दही-पराठे खाने में आये। तनमन संपूरित हो उठे। सूर्यनारायण की उठती हुईं रश्मियों के साथ ही साथ हम भी चलने को तैयार हुए। राम-राम के साथ विदा लेते हुए सलाह मिली कि यदि चनों के साथ उतनी ही मात्रा में मीठे मखाणे मिला कर बीच-बीच में फाका मारते जायें तो रोटियों की जरुरत कम पङेगी। दाहा से तीन ही कोस पर बुढ़ाना नगर आ जाता है। तो बुढ़ाना में हमनेे किया क्या कि ढाई सेर चने और इतने हीे मखाणे ख़रीद लिए।

प्रथम स्वछंद (साईकिल) यात्रा — भाग 'दो'

सितंबर 07, 2002 (दूसरा दिन)

उसे जागना तो नहीं कह सकते। जब रातभर सोऐ ही नहीं तो सवेरे जागना कैसा? उठे और कोठे से बाहर हम आये। पास बहते रजबाहे में मुंह धोया और इधर-उधर दृष्टि घुमाई। उस सुबह की शोभा का क्या कहना है! सूर्योदय से पूर्व जो लाल ओढ़नी आकाश ओढ़े रहता है वह लालिमा, पृथ्वी पर चारों ओर फैले हरियाली के दुशाले से संयोग कर तिरंगे का भान कराती थी। कितनी ही चिडियाऐं सुप्त प्राणियों को जगाने को चिंहुक रहीं थीं। यमुना तीर की सीलक देह के खुले रोओं से भीतर घुली जाती थी। उस भले वातावरण में मुझे माता की याद आई तो ह्रदय में हूक उठी। मां ही क्या, क्या घरवाले रात्रिभर चैन पाए होंगे? अब तक तो न जाने कहाँ ढूंढ पड गई होगी? परिजनों के पैर इधर से उधर न जाने कहाँ कहाँ दौड़ते फिरते होंगे? बुद्धि अवश्य ही बोध त्याग चुकी होगी। हम यह सब सोच कर अपने ही में छटपटाते थे। अपराध-बोध का भी ग्रास बने जाते थे। परंतु विश्व-दर्शन को यह कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी।

प्रथम स्वछंद (साईकिल) यात्रा — भाग 'एक'

घुमक्कड़ होना आसान चीज़ नहीं। और यह भी नहीं है कि चाहे जिस उम्र में यायावरी शुरू कर दी जाये। यह “जब जागो तब सवेरा” वाली चीज़ नहीं है। वास्तव में इसके बीजांकुर बालपन ही में फूटने लगते हैं। पश्चात, किसी वृक्ष की भांति फलने-फूलने के लिए इसे समय की खाद चाहिए, उम्र का अवलंब चाहिये, अनुभवों का जल चाहिये। “प्रथम परवाज़” ऐसे ही महत्वपूर्ण घटकों का - उन्मुक्त यायावरी के लिए आवश्यक - समेत किस्सागोई संग्रह है। लेखक के जीवन की यात्राओं-और स्वयं जीवन यात्रा ही का-प्रकाशन तो खैर बाद में होने वाला ही है परंतु यहां घुमक्कड़ी जीवन के आरंभिक दिनों के कुछ तजरबे प्रकाशमान किये देते हैं। हरियाणा प्रांत के बराही ग्राम से निकल कर जब पहिली दफा घुमक्कड़ी पथ पर पग रखा और उस दौरान जो कुछ देखा-भोगा उसका वर्णन किया जाता है।

प्रथम स्वछंद यात्रा — साईकिल पर

प्रथम परवाज़ के यह कुछ क्षण हैं जिन्हें-हमारा तो कहना ही क्या है-पाठकगण भी यात्रा-वृतांत की समाप्ति के उपरांत भुला नहीं सकेंगे। चलिये चल पड़िऐ कुछ कदम मेरे साथ, एक ऐसे सफर पर जो अब से साढे पंद्रह बरस पुराना है मगर ताज़गी जैसे कल ही की लिऐ हुऐ है। एक नवतरुण की पहली उड़ान का सफ़र, पहले दुस्साहस की बात और घुमक्कड़ी को आहुत घर से निकल भागने की कहानी…

हाडौती-मेवाड़ यात्रा-वृतांत

Hadoti Mewar Travelogue
“क्यों न अबकी बार हवाई जहाज से कहीं घूमने चला जाये”- खेतों के मेढ़ पर बैठे हमारे मुंह से सुंदर और रविंद्र के लिए निकला।

“हवाई जहाज से!”- सुंदर ने कहा - “नहीं यार, बहुत खर्चा हो जायेगा।”

हमने कहा कि यह तजुरबा भी कभी कर के देखना चाहिए। यकीन मानो कि पहली पहल हवाई यात्रा बडी उत्तेजना भरी होती है। इसका अपना ही एक अलग मजा है। पहला हवाई सफर अपने आप में हासिल-ए-मंजिल है। और कुछेक चिकनी-चुपड़ी लगाकर उन दोनों को शीशे में हमने उतार लिया। फिर शुरु हुई एक सस्ती सी उड़ान की तलाश। आजकल कितनी सुविधाएं हो गई हैं। बस इंटरनेट युक्त एक मोबाइल फोन आपके हाथ में हो तो कुछ भी जानकारी ढुंढ निकालना सरल है। दिल्ली से जयपुर किफ़ायती हवाई सफर के मुफीद निकला। एक सहस्र रुपये में टिकट मिल जा रही थी। इससे सस्ती हवाई यात्रा और क्या होगी? इससे दोगुनी रकम तो टैक्सी वाला मांग लेता। तो, दो दिन में टिकट बुक कर लेने का जिम्मा लेकर हम वहां से उठे।

फूलों की घाटी (यात्रा-वृतांत) भाग-4

फूलों की घाटी (यात्रा-वृतांत) : भाग-1 | भाग-2 | भाग-3 | भाग-4 | भाग-5 | भाग-6

फूलों की घाटी यात्रा का आज अंतिम दिन था और छुट्टी का भी। 24 घंटे में दिल्ली पहुंच जाना है ताकि समय से काम पर लौट सकूं। गोविंदघाट से दिल्ली बहुत दूर तो नहीं है, यही कोई साढे पांच सौ या पौने छह सौ किलोमीटर है। 24 घंटे में तो आसानी से पहुंच सकते हैं। लेकिन एक तो आधे से ज्यादा पहाङी रास्ता और उपर से मैं अब व्हीकल को धीरे भी चलाने लगा हूं, 70 की स्पीड भी तब पकङता हूं जब कोई इमरजेंसी आ जाये। फिर भी उम्मीद है कि आज सवेरे सवेरे निकल कर लगातार चलते हुये कल सवेरे तक घर पहुंच ही जाउंगा।

फूलों की घाटी (यात्रा-वृतांत) भाग-3

फूलों की घाटी (यात्रा-वृतांत) : भाग-1 | भाग-2 | भाग-3 | भाग-4 | भाग-5 | भाग-6

चमोली जिले में तिब्बत-भारत सीमा से कुछ ही दूर स्थित है फूलों की घाटी राष्ट्रीय उद्यान, जो नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क के साथ मिल कर संयुक्त रूप से नंदा देवी बायोस्फीयर रिज़र्व का निर्माण करता है। भौगोलिक रूप से यह जगह वृहद हिमालय और जांस्कर श्रेणियों के मध्य स्थित है, हालांकि बहुतेरे लोग इसे जांस्कर का ही एक भाग मानते हैं। घाटी का कुल क्षेत्रफल करीब 87 वर्ग किलोमीटर है, हालांकि इसका 70 प्रतिशत भाग हिम से ढका रहता है। शेष क्षेत्र में 520 वनस्पतियों की पहचान अब तक की गई है, जिसमें से 500 से अधिक प्रजातियां फूलों की हैं।

फूलों की घाटी (यात्रा-वृतांत) भाग-2

आज हमें जोशीमठ से निकल कर पहले गोविंदघाट जाना था। वहां गाङी को पार्किंग में लगाकर ट्रैक शुरू करना था। हालांकि अब गोविंदघाट से तीन किलोमीटर आगे पुलना गांव तक सङक बन गई है लेकिन इस पर आप अपनी गाङी लेकर ना जायें चूंकि पुलना में कार पार्किंग की सुविधा नहीं है। हां, मोटरसाईकिलों के लिये पार्किंग की अच्छी सुविधा है। गोविंदघाट से पुलना तक जीप चलती हैं। उनमें भी जा सकते हैं या फिर पैदल भी निकल सकते हैं। हमने जीप पकङी और बीस मिनट में पुलना जा पहुंचे।

फूलों की घाटी (यात्रा-वृतांत) भाग-1

बेनज़ीर कुदरती खूबसूरती, दुर्लभ हो चुकीं उच्च पर्वतीय वनस्पतियों व जीवों का ठिकाना और सरकारी उपेक्षा का शिकार एक ऐसा स्वर्ग जिसकी मिसाल पूरे हिमालय में और कहीं भी नहीं है। जी हां मित्रों, ये आगाज़ है मेरी फूलों की घाटी की यात्रा का। और मुझे पूरा यकीन है कि यह यात्रा-वृतांत आपको एक अलग ही दुनिया से रू-ब-रू करायेगा। वर्ष 2004 में फूलों की घाटी को युनेस्को की विश्व विरासत सूची में सम्मिलित करने हेतू नामांकित किया गया था और एक वर्ष बाद यानि वर्ष 2005 में इसे युनेस्को द्वारा विश्व विरासत स्थल घोषित कर दिया गया। अब यह घाटी भारत में मौजूद कुल 35 विश्व विरासत धरोहरों में से एक है। तो चलिये चले चलते हैं देवभूमि उत्तराखंड में स्थित फूलों की घाटी की यात्रा पर, कुछ कदम मेरे साथ...

हिमाचल मोटरसाईकिल यात्रा (कुल्लू से दिल्ली) भाग-06

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हिमाचल मोटरसाईकिल यात्रा का पांचवा और अंतिम रैन-बसेरा सिद्ध हुआ कुल्लू। कल मैं और रविन्द्र अपनी मोटरसाईकिल को लोसर से एक गाङी में लादकर यहां तक लाये थे और आज दिल्ली (अपने घर) की ओर कूच कर दिया जायेगा। पर उससे पहले चंद बातें कुल्लू के बारे में कर लें। पर्यटन में मनाली के प्रभुत्व के आगे कुल्लू दबा हुआ सा दिखता है। ऐसे सैलानियों की कोई कमी नहीं जो कुल्लू-मनाली घूमने की कहकर घर से निकलते हैं पर मनाली और रोहतांग देखकर वापस हो लेते हैं। जबकि हकीकत तो ये है कि हर तरह के मौसम और हर तरह के सैलानी के लिये इधर का प्रवेश-द्वार कुल्लू ही है। हर दिल अजीज़ रोहतांग, मनाली, मणिकर्ण, नग्गर आदि के बारे में तो सब जानते ही हैं। इन सब के मार्ग कुल्लू से ही निकलते हैं। खीरगंगा, बिजली महादेव, चंद्रखनी, मलाणा जैसे मध्यम दर्जे के ट्रेकों के लिये भी यहीं से मार्ग निकलते हैं। हाई-ऑल्टीट्यूड ट्रेकिंग रूट जैसे सारा-उमगा और हामता पास भी कुल्लू से ही निकलते हैं जो कुंजुंम पास और बारालाचा-ला होते हुये सीधे लद्दाख में पहुँचा देते हैं। और तो और बगैर किन्नौर जाये पिन-पार्वती पास से होकर सीधे स्पीति के गढ काजा तक भी कुल्लू से जाया जा सकता है। कुल्लू स्वयं अपने भीतर अनेक आकर्षण समेटे हुये है। रघुनाथ और श्रृंग ऋषि जैसे अनेक मंदिर हैं, फिशिंग और राफ्टिंग के लिये ब्यास है, बौद्ध मठ भी हैं। कुल्लू का दशहरा तो विश्व-प्रसिद्ध है ही। क्या कुछ नहीं है कुल्लू में?

हिमाचल मोटरसाईकिल यात्रा (लोसर से कुल्लू) भाग-05

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हिमाचल मोटरसाईकिल यात्रा का चौथा रैन-बसेरा लोसर तेरह हजार फीट से ज्यादा की उंचाई पर स्थित है। यह उंचाई बहुत तो है पर इतनी भी अधिक नहीं कि इंसान प्राण त्याग दे। तेरह हजार फीट तक ऑक्सीजन का स्तर इतना भी नहीं गिर जाता। हिमालय के इस पार तो चौदह-पन्द्रह हजार फीट की उंचाई वैसे भी आम होती है। पर गर्म मैदानों के प्राणियों के शरीर का क्या भरोसा? खुद को महामहिम समझने वाले बहुत से मैदानी जब स्पीति और लद्दाख की ऐसी उंचाईयों पर पहुँचते हैं तो उन्हें अपनी असली औकात पता चल जाती है। आमतौर पर यूं भी शांत ही रहने वाला मैं, इन पहाङों की असीमता के आगे नतमस्तक होकर और भी शांतचित हो गया। ये ऐसी जगहें हैं जो निःशब्द रहकर आदमी को उसके बौनेपन का सतत् बोध कराती रहती है।

हिमाचल मोटरसाईकिल यात्रा (चांगो से लोसर) भाग-04

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चौथा दिन और आज किन्नौर से आऊट हो जाने की तैयारी। कल जब चांगो पहुँचा था तो जीभ में कसक थी इसके सेब परखने की। चांगो के सेब बहुत ही उम्दा क्वालिटी के बताये जाते हैं। ये नौ हजार फीट से भी ज्यादा की उंचाई पर फलते हैं। लेकिन शाम ही से घर की याद आने लगी थी। जी करता था कि बस कैसे भी उङकर अभी घर पहुँच जाउं लेकिन मैं नभचर तो नहीं। काश होता! रविन्द्र का भी यही हाल था। मैं पहले भी घर से बाहर कई-कई दिनों तक रह चुका हूँ, वो भी ऐसी परिस्थितियों में जबकि जेब में पैसे तक नहीं बच पाते थे खाने के लिये। शिलांग भ्रमण के दौरान 2500 रूपये से भी कम खर्चे में एक सप्ताह की यात्रा कर डाली थी जिसमें दिल्ली से आने-जाने का किराया, होटल और खाना सब कुछ शामिल है। एक यात्रा और भी है जब 12 दिनों की यात्रा मात्र 1200 रूपये में निपटा दी थी। पर अब से पहले ऐसा कभी नहीं हुआ। अब तो काम चलाने योग्य पैसे भी जेब में रहते ही हैं। फिर भी अब ऐसा क्यों?

हिमाचल मोटरसाईकिल यात्रा (कल्पा से चांगो) भाग-03

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हिमाचल मोटरसाईकिल यात्रा का तीसरा दिन और मैं किन्नौर में हूँ। किन्नौर में हिमालय की दो बेहद महत्वपूर्ण श्रृंखलाऐं हैं- जांस्कर और वृहद हिमालय। स्पीति की ओर इसके निचले छोर के पास ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क है और उससे कुछ उपर पिन वैली नेशनल पार्क। भाबा, सांगला, बस्पा, रोपा और चरांग जैसी सुरम्य घाटियां किन्नौर के किसी नगीने से कम नहीं। फिर किन्नौर-कैलाश की चार-पाँच दिनी पैदल परिक्रमा तो होती ही है घुमक्कङों की दिली ख्वाहिश। साहसी ट्रेकर खूब रूख करते हैं इनकी तरफ। किन्नौर की हद भारत और तिब्बत के बीच अंतरराष्ट्रीय सीमा है। किन्नौर के लिये पहले इनर-लाइन परमिट लेना होता था पर अब लगभग सारा किन्नौर (शिपकी-ला, कौरिक जैसे इलाकों को छोङकर) आम भारतीय नागरिकों के लिये बिना परमिट के खुला हुआ है, इस हद तक कि तिब्बत के इलाके तक बिना दूरबीन के साफ दिख जायें। हिन्दुस्तान-तिब्बत रोड (NH-22) के अंतिम छोर “खाब” तक भी आप जा सकते हैं। रिकांगपिओ और कल्पा किन्नौर के दिल हैं और ये एक तरह से दो संस्कृतियों का जंक्शन भी हैं। यहां से काज़ा को बढते हुये इलाका बौद्ध बहुल होने लगता है तो शिमला की ओर बढते हुये हिन्दू बहुल। रिकांगपिओ और कल्पा में हिन्दू और बौद्ध दोनों ही धर्म एक साथ श्वास लेते हैं। आज की सुबह मैं कल्पा में हूँ यानि किन्नौर की खूबसूरती के गढ में। अन्य जगहों की तरह रविन्द्र बार-बार इसका नाम भी भूल जाता था और कल्पा की बजाय कल्पना-कल्पना जपने लगता था। जो वहां नहीं गऐ वो बस कल्पा की सुंदरता की कल्पना ही कर सकते हैं। कल्पा में ताबो जितनी पुरानी पर उससे कम प्रसिद्ध हू-बू-लान-कार मोनेस्ट्री है और नारायण-नागनी मंदिर के रूप में स्थानीय शिल्प-कौशल का नमूना भी है। सेब और आङू के बेइंतहा बाग तो हैं ही। जिधर देखो सेब ही सेब। चिलगोजे और अखरोट भी हैं। दिल्ली से रिकांगपिओ की दूरी साढे पाँच सौ किलोमीटर के लगभग है और दोनों शहरों के बीच सीधी बस सेवा है। रिकांगपिओ से कल्पा दस किलोमीटर भी नहीं है।

हिमाचल मोटरसाईकिल यात्रा (नारकंडा से कल्पा) भाग-02

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बंजारा हूँ, मैं कहां बस्ती में रहता हूँ।
आवारा झोंका हूँ, अपनी मस्ती में रहता हूँ।
हिमाचल मोटरसाईकिल यात्रा का आज मेरा ये दूसरा दिन है। कल जब नारकंडा पहुँचा था तो मौसम खराब होने लगा था इसलिऐ यहीं रूक गया। फिर दिन ढले झमाझम बारिश भी खूब हुई। दोपहर बाद हिमालय में बारिश हो जाना कोई असामान्य बात है भी नहीं। सो ये सोचकर कि सुबह मौसम खुला हुआ मिलना ही है, आराम से सोये। लगातार 15 घंटे की बाईक-राइडिंग किसी को भी थका सकती है। मुझे भी थकाया। नतीजा ये हुआ कि आज नारकंडा से तैयार होकर निकलने में 10 बज गये। लंबी यात्राओं में समय महत्वपूर्ण होता है और हमने कम से कम तीन घंटे का वक्त जाया कर दिया। खैर बाईक के पास आये और अपना सामान बांधा। इसके बाद कुछ समय नारकंडा के आसपास के नजारे में लेने लग गया।

नारकंडा हिमालय की शिवालिक रेंज में करीब 2730 मीटर की उंचाई पर है। जाहिर है मौसम में ठंडक घुली रहती है। रजाईयों की जरूरत बनी रहती है। गर्म जॉकेट पहनने पर भी सितंबर की दस बजे की धूप बङी गुनगुनी लग रही थी। हिन्दुस्तान-तिब्बत रोड नारकंडा के बीच से गुजरता है। यह रामपुर-बुशैहर और शिमला के ठीक बीच में स्थित है। दोनों शहर इससे करीब 65-65 किलोमीटर आगे-पीछे हैं। मुख्य कस्बे के दक्षिण-पूर्व में है हाटू चोटी। 3000 मीटर से अधिक उंचाई वाली यह चोटी स्थानियों के लिये काफी पवित्र है। इस पर एक मंदिर भी बना हुआ है। कोई निजी होटल तो नहीं है, हां लेकिन एक सरकारी रेस्ट-हाऊस अवश्य है। नारकंडा कस्बे से करीब आठ किलोमीटर की चढाई के बाद वहां पहुँच सकते हैं। चाहे तो ट्रेकिंग कर सकते हैं या फिर अपने वाहन से भी जा सकते हैं। सङक उपर तक गई है। मौसम खराब ना हो तो अपना टैंट भी लगा सकते है। उत्तर-पूर्व की ओर देखने पर आपको कोटगढ के सेब के बाग आसानी से दिख जायेंगें। अच्छी क्वालिटी के सेब बहुत होते हैं यहां। सत्यानन्द स्टॉक्स (सैमुअल इवान स्टॉक्स) एक अमरीकी थे जिन्होंने इस क्षेत्र की अर्थव्यवसथा को सुधारने के लिये यहां सेबों की खेती आरंभ की थी। कोटगढ और थानाधार की दूरी नारकंडा से ज्यादा नहीं है। थानाधार भी एक सुंदर जगह है। एक झील भी है इसके आस-पास पर अब उसका नाम याद नहीं आ रहा। नारकंडा में एक पैट्रोल-पंप भी है। इसके बाद पैट्रोल-पंप रामपुर में ही मिलता है। नारकंडा से श्रीखंड महादेव भी साफ दिखाई देता है। उत्तर-पश्चिम दिशा की ओर देखने पर यदि मौसम साफ हो तो श्रीखंड महादेव और कार्तिकेय चोटियां पहाङों की अंतिम कतार में खङी दिखाई देती हैं।

पिंजौर गार्डन (हिमाचल मोटरसाईकिल यात्रा, भाग-01)

फूलों की घाटी का कार्यक्रम रद्द हो जाने की वजह से मन बहुत दुःखी हो गया था। कई कोशिशें करने के बावजूद उत्तराखंड यात्रा बार-बार टल रही थी। इस बार तो ऐन मौके पर जाना रद्द हुआ, बैग तक आधे पैक हो गऐ थे और फिर से उत्तराखंड यात्रा टल गई। मैं खीज गया। तेरी ऐसी की तैसी। एक तू ही है क्या भारत में? उत्तराखंड, अब आऊंगा ही नहीं तेरे यहां। कहीं और चला जाऊंगा। पङा रह अपनी मरोङ में। फटाफट हिमाचल का प्रोग्राम बना डाला। हिमाचल की कई जगहें मेरी टारगेट-लिस्ट में शामिल थीं। शिपकी-ला, किब्बर, प्राचीन हिन्दुस्तान-तिब्बत रोड, एन.एच. 05, काज़ा आदि। कुछ बौद्ध मठों को भी साथ में देखने का कार्यक्रम बनाया और एक लंबी दूरी की मोटरसाईकिल यात्रा फिक्स हो गई।

यात्रा-प्रोग्राम

तय कार्यक्रम की एक झलक नीचे दिखा रहा हूँ।
पहला दिनः पिंजौर गार्डन देखते हुये शिमला तक और आगे प्राचीन हिन्दुस्तान-तिब्बत रोड से होते हुये रामपुर तक।
दूसरा दिनः कल्पा, रोघी देखते हुये सांगला घाटी और छितकुल तक।
तीसरा दिनः शिपकी-ला देखते हुये दुर्गमतम एन.एच. 05 से होते हुये गियू, नाको, धनकर और ताबो मठ घूमकर काजा तक।
चौथा दिनः किब्बर और कीह देखते हुये कुंजम पास, चंद्रा घाटी और रोहतांग पास से होते हुये मनाली तक।
पांचवा दिनः दिल्ली वापस।