प्रथम स्वछंद यात्रा — साईकिल पर

प्रथम परवाज़ के यह कुछ क्षण हैं जिन्हें-हमारा तो कहना ही क्या है-पाठकगण भी यात्रा-वृतांत की समाप्ति के उपरांत भुला नहीं सकेंगे। चलिये चल पड़िऐ कुछ कदम मेरे साथ, एक ऐसे सफर पर जो अब से सोलह बरस पुराना है मगर ताज़गी जैसे कल ही की लिऐ हुऐ है। एक नवतरुण की पहली उड़ान का सफ़र, पहले दुस्साहस की बात और घुमक्कड़ी को आहुत घर से निकल भागने की कहानी…

हाडौती-मेवाड़ यात्रा-वृतांत

Hadoti Mewar Travelogue
“क्यों न अबकी बार हवाई जहाज से कहीं घूमने चला जाये”- खेतों के मेढ़ पर बैठे हमारे मुंह से सुंदर और रविंद्र के लिए निकला।

“हवाई जहाज से!”- सुंदर ने कहा - “नहीं यार, बहुत खर्चा हो जायेगा।”

हमने कहा कि यह तजुरबा भी कभी कर के देखना चाहिए। यकीन मानो कि पहली पहल हवाई यात्रा बडी उत्तेजना भरी होती है। इसका अपना ही एक अलग मजा है। पहला हवाई सफर अपने आप में हासिल-ए-मंजिल है। और कुछेक चिकनी-चुपड़ी लगाकर उन दोनों को शीशे में हमने उतार लिया। फिर शुरु हुई एक सस्ती सी उड़ान की तलाश। आजकल कितनी सुविधाएं हो गई हैं। बस इंटरनेट युक्त एक मोबाइल फोन आपके हाथ में हो तो कुछ भी जानकारी ढुंढ निकालना सरल है। दिल्ली से जयपुर किफ़ायती हवाई सफर के मुफीद निकला। एक सहस्र रुपये में टिकट मिल जा रही थी। इससे सस्ती हवाई यात्रा और क्या होगी? इससे दोगुनी रकम तो टैक्सी वाला मांग लेता। तो, दो दिन में टिकट बुक कर लेने का जिम्मा लेकर हम वहां से उठे।

फूलों की घाटी (यात्रा-वृतांत) भाग-4

फूलों की घाटी (यात्रा-वृतांत) : भाग-1 | भाग-2 | भाग-3 | भाग-4 | भाग-5 | भाग-6

फूलों की घाटी यात्रा का आज अंतिम दिन था और छुट्टी का भी। 24 घंटे में दिल्ली पहुंच जाना है ताकि समय से काम पर लौट सकूं। गोविंदघाट से दिल्ली बहुत दूर तो नहीं है, यही कोई साढे पांच सौ या पौने छह सौ किलोमीटर है। 24 घंटे में तो आसानी से पहुंच सकते हैं। लेकिन एक तो आधे से ज्यादा पहाङी रास्ता और उपर से मैं अब व्हीकल को धीरे भी चलाने लगा हूं, 70 की स्पीड भी तब पकङता हूं जब कोई इमरजेंसी आ जाये। फिर भी उम्मीद है कि आज सवेरे सवेरे निकल कर लगातार चलते हुये कल सवेरे तक घर पहुंच ही जाउंगा।

फूलों की घाटी (यात्रा-वृतांत) भाग-3

फूलों की घाटी (यात्रा-वृतांत) : भाग-1 | भाग-2 | भाग-3 | भाग-4 | भाग-5 | भाग-6

चमोली जिले में तिब्बत-भारत सीमा से कुछ ही दूर स्थित है फूलों की घाटी राष्ट्रीय उद्यान, जो नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क के साथ मिल कर संयुक्त रूप से नंदा देवी बायोस्फीयर रिज़र्व का निर्माण करता है। भौगोलिक रूप से यह जगह वृहद हिमालय और जांस्कर श्रेणियों के मध्य स्थित है, हालांकि बहुतेरे लोग इसे जांस्कर का ही एक भाग मानते हैं। घाटी का कुल क्षेत्रफल करीब 87 वर्ग किलोमीटर है, हालांकि इसका 70 प्रतिशत भाग हिम से ढका रहता है। शेष क्षेत्र में 520 वनस्पतियों की पहचान अब तक की गई है, जिसमें से 500 से अधिक प्रजातियां फूलों की हैं।

फूलों की घाटी (यात्रा-वृतांत) भाग-2

आज हमें जोशीमठ से निकल कर पहले गोविंदघाट जाना था। वहां गाङी को पार्किंग में लगाकर ट्रैक शुरू करना था। हालांकि अब गोविंदघाट से तीन किलोमीटर आगे पुलना गांव तक सङक बन गई है लेकिन इस पर आप अपनी गाङी लेकर ना जायें चूंकि पुलना में कार पार्किंग की सुविधा नहीं है। हां, मोटरसाईकिलों के लिये पार्किंग की अच्छी सुविधा है। गोविंदघाट से पुलना तक जीप चलती हैं। उनमें भी जा सकते हैं या फिर पैदल भी निकल सकते हैं। हमने जीप पकङी और बीस मिनट में पुलना जा पहुंचे।

फूलों की घाटी (यात्रा-वृतांत) भाग-1

बेनज़ीर कुदरती खूबसूरती, दुर्लभ हो चुकीं उच्च पर्वतीय वनस्पतियों व जीवों का ठिकाना और सरकारी उपेक्षा का शिकार एक ऐसा स्वर्ग जिसकी मिसाल पूरे हिमालय में और कहीं भी नहीं है। जी हां मित्रों, ये आगाज़ है मेरी फूलों की घाटी की यात्रा का। और मुझे पूरा यकीन है कि यह यात्रा-वृतांत आपको एक अलग ही दुनिया से रू-ब-रू करायेगा। वर्ष 2004 में फूलों की घाटी को युनेस्को की विश्व विरासत सूची में सम्मिलित करने हेतू नामांकित किया गया था और एक वर्ष बाद यानि वर्ष 2005 में इसे युनेस्को द्वारा विश्व विरासत स्थल घोषित कर दिया गया। अब यह घाटी भारत में मौजूद कुल 35 विश्व विरासत धरोहरों में से एक है। तो चलिये चले चलते हैं देवभूमि उत्तराखंड में स्थित फूलों की घाटी की यात्रा पर, कुछ कदम मेरे साथ...

हिमाचल मोटरसाईकिल यात्रा (कुल्लू से दिल्ली) भाग-06

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हिमाचल मोटरसाईकिल यात्रा का पांचवा और अंतिम रैन-बसेरा सिद्ध हुआ कुल्लू। कल मैं और रविन्द्र अपनी मोटरसाईकिल को लोसर से एक गाङी में लादकर यहां तक लाये थे और आज दिल्ली (अपने घर) की ओर कूच कर दिया जायेगा। पर उससे पहले चंद बातें कुल्लू के बारे में कर लें। पर्यटन में मनाली के प्रभुत्व के आगे कुल्लू दबा हुआ सा दिखता है। ऐसे सैलानियों की कोई कमी नहीं जो कुल्लू-मनाली घूमने की कहकर घर से निकलते हैं पर मनाली और रोहतांग देखकर वापस हो लेते हैं। जबकि हकीकत तो ये है कि हर तरह के मौसम और हर तरह के सैलानी के लिये इधर का प्रवेश-द्वार कुल्लू ही है। हर दिल अजीज़ रोहतांग, मनाली, मणिकर्ण, नग्गर आदि के बारे में तो सब जानते ही हैं। इन सब के मार्ग कुल्लू से ही निकलते हैं। खीरगंगा, बिजली महादेव, चंद्रखनी, मलाणा जैसे मध्यम दर्जे के ट्रेकों के लिये भी यहीं से मार्ग निकलते हैं। हाई-ऑल्टीट्यूड ट्रेकिंग रूट जैसे सारा-उमगा और हामता पास भी कुल्लू से ही निकलते हैं जो कुंजुंम पास और बारालाचा-ला होते हुये सीधे लद्दाख में पहुँचा देते हैं। और तो और बगैर किन्नौर जाये पिन-पार्वती पास से होकर सीधे स्पीति के गढ काजा तक भी कुल्लू से जाया जा सकता है। कुल्लू स्वयं अपने भीतर अनेक आकर्षण समेटे हुये है। रघुनाथ और श्रृंग ऋषि जैसे अनेक मंदिर हैं, फिशिंग और राफ्टिंग के लिये ब्यास है, बौद्ध मठ भी हैं। कुल्लू का दशहरा तो विश्व-प्रसिद्ध है ही। क्या कुछ नहीं है कुल्लू में?

हिमाचल मोटरसाईकिल यात्रा (लोसर से कुल्लू) भाग-05

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हिमाचल मोटरसाईकिल यात्रा का चौथा रैन-बसेरा लोसर तेरह हजार फीट से ज्यादा की उंचाई पर स्थित है। यह उंचाई बहुत तो है पर इतनी भी अधिक नहीं कि इंसान प्राण त्याग दे। तेरह हजार फीट तक ऑक्सीजन का स्तर इतना भी नहीं गिर जाता। हिमालय के इस पार तो चौदह-पन्द्रह हजार फीट की उंचाई वैसे भी आम होती है। पर गर्म मैदानों के प्राणियों के शरीर का क्या भरोसा? खुद को महामहिम समझने वाले बहुत से मैदानी जब स्पीति और लद्दाख की ऐसी उंचाईयों पर पहुँचते हैं तो उन्हें अपनी असली औकात पता चल जाती है। आमतौर पर यूं भी शांत ही रहने वाला मैं, इन पहाङों की असीमता के आगे नतमस्तक होकर और भी शांतचित हो गया। ये ऐसी जगहें हैं जो निःशब्द रहकर आदमी को उसके बौनेपन का सतत् बोध कराती रहती है।

हिमाचल मोटरसाईकिल यात्रा (चांगो से लोसर) भाग-04

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चौथा दिन और आज किन्नौर से आऊट हो जाने की तैयारी। कल जब चांगो पहुँचा था तो जीभ में कसक थी इसके सेब परखने की। चांगो के सेब बहुत ही उम्दा क्वालिटी के बताये जाते हैं। ये नौ हजार फीट से भी ज्यादा की उंचाई पर फलते हैं। लेकिन शाम ही से घर की याद आने लगी थी। जी करता था कि बस कैसे भी उङकर अभी घर पहुँच जाउं लेकिन मैं नभचर तो नहीं। काश होता! रविन्द्र का भी यही हाल था। मैं पहले भी घर से बाहर कई-कई दिनों तक रह चुका हूँ, वो भी ऐसी परिस्थितियों में जबकि जेब में पैसे तक नहीं बच पाते थे खाने के लिये। शिलांग भ्रमण के दौरान 2500 रूपये से भी कम खर्चे में एक सप्ताह की यात्रा कर डाली थी जिसमें दिल्ली से आने-जाने का किराया, होटल और खाना सब कुछ शामिल है। एक यात्रा और भी है जब 12 दिनों की यात्रा मात्र 1200 रूपये में निपटा दी थी। पर अब से पहले ऐसा कभी नहीं हुआ। अब तो काम चलाने योग्य पैसे भी जेब में रहते ही हैं। फिर भी अब ऐसा क्यों?

हिमाचल मोटरसाईकिल यात्रा (कल्पा से चांगो) भाग-03

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हिमाचल मोटरसाईकिल यात्रा का तीसरा दिन और मैं किन्नौर में हूँ। किन्नौर में हिमालय की दो बेहद महत्वपूर्ण श्रृंखलाऐं हैं- जांस्कर और वृहद हिमालय। स्पीति की ओर इसके निचले छोर के पास ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क है और उससे कुछ उपर पिन वैली नेशनल पार्क। भाबा, सांगला, बस्पा, रोपा और चरांग जैसी सुरम्य घाटियां किन्नौर के किसी नगीने से कम नहीं। फिर किन्नौर-कैलाश की चार-पाँच दिनी पैदल परिक्रमा तो होती ही है घुमक्कङों की दिली ख्वाहिश। साहसी ट्रेकर खूब रूख करते हैं इनकी तरफ। किन्नौर की हद भारत और तिब्बत के बीच अंतरराष्ट्रीय सीमा है। किन्नौर के लिये पहले इनर-लाइन परमिट लेना होता था पर अब लगभग सारा किन्नौर (शिपकी-ला, कौरिक जैसे इलाकों को छोङकर) आम भारतीय नागरिकों के लिये बिना परमिट के खुला हुआ है, इस हद तक कि तिब्बत के इलाके तक बिना दूरबीन के साफ दिख जायें। हिन्दुस्तान-तिब्बत रोड (NH-22) के अंतिम छोर “खाब” तक भी आप जा सकते हैं। रिकांगपिओ और कल्पा किन्नौर के दिल हैं और ये एक तरह से दो संस्कृतियों का जंक्शन भी हैं। यहां से काज़ा को बढते हुये इलाका बौद्ध बहुल होने लगता है तो शिमला की ओर बढते हुये हिन्दू बहुल। रिकांगपिओ और कल्पा में हिन्दू और बौद्ध दोनों ही धर्म एक साथ श्वास लेते हैं। आज की सुबह मैं कल्पा में हूँ यानि किन्नौर की खूबसूरती के गढ में। अन्य जगहों की तरह रविन्द्र बार-बार इसका नाम भी भूल जाता था और कल्पा की बजाय कल्पना-कल्पना जपने लगता था। जो वहां नहीं गऐ वो बस कल्पा की सुंदरता की कल्पना ही कर सकते हैं। कल्पा में ताबो जितनी पुरानी पर उससे कम प्रसिद्ध हू-बू-लान-कार मोनेस्ट्री है और नारायण-नागनी मंदिर के रूप में स्थानीय शिल्प-कौशल का नमूना भी है। सेब और आङू के बेइंतहा बाग तो हैं ही। जिधर देखो सेब ही सेब। चिलगोजे और अखरोट भी हैं। दिल्ली से रिकांगपिओ की दूरी साढे पाँच सौ किलोमीटर के लगभग है और दोनों शहरों के बीच सीधी बस सेवा है। रिकांगपिओ से कल्पा दस किलोमीटर भी नहीं है।

हिमाचल मोटरसाईकिल यात्रा (नारकंडा से कल्पा) भाग-02

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बंजारा हूँ, मैं कहां बस्ती में रहता हूँ।
आवारा झोंका हूँ, अपनी मस्ती में रहता हूँ।
हिमाचल मोटरसाईकिल यात्रा का आज मेरा ये दूसरा दिन है। कल जब नारकंडा पहुँचा था तो मौसम खराब होने लगा था इसलिऐ यहीं रूक गया। फिर दिन ढले झमाझम बारिश भी खूब हुई। दोपहर बाद हिमालय में बारिश हो जाना कोई असामान्य बात है भी नहीं। सो ये सोचकर कि सुबह मौसम खुला हुआ मिलना ही है, आराम से सोये। लगातार 15 घंटे की बाईक-राइडिंग किसी को भी थका सकती है। मुझे भी थकाया। नतीजा ये हुआ कि आज नारकंडा से तैयार होकर निकलने में 10 बज गये। लंबी यात्राओं में समय महत्वपूर्ण होता है और हमने कम से कम तीन घंटे का वक्त जाया कर दिया। खैर बाईक के पास आये और अपना सामान बांधा। इसके बाद कुछ समय नारकंडा के आसपास के नजारे में लेने लग गया।

नारकंडा हिमालय की शिवालिक रेंज में करीब 2730 मीटर की उंचाई पर है। जाहिर है मौसम में ठंडक घुली रहती है। रजाईयों की जरूरत बनी रहती है। गर्म जॉकेट पहनने पर भी सितंबर की दस बजे की धूप बङी गुनगुनी लग रही थी। हिन्दुस्तान-तिब्बत रोड नारकंडा के बीच से गुजरता है। यह रामपुर-बुशैहर और शिमला के ठीक बीच में स्थित है। दोनों शहर इससे करीब 65-65 किलोमीटर आगे-पीछे हैं। मुख्य कस्बे के दक्षिण-पूर्व में है हाटू चोटी। 3000 मीटर से अधिक उंचाई वाली यह चोटी स्थानियों के लिये काफी पवित्र है। इस पर एक मंदिर भी बना हुआ है। कोई निजी होटल तो नहीं है, हां लेकिन एक सरकारी रेस्ट-हाऊस अवश्य है। नारकंडा कस्बे से करीब आठ किलोमीटर की चढाई के बाद वहां पहुँच सकते हैं। चाहे तो ट्रेकिंग कर सकते हैं या फिर अपने वाहन से भी जा सकते हैं। सङक उपर तक गई है। मौसम खराब ना हो तो अपना टैंट भी लगा सकते है। उत्तर-पूर्व की ओर देखने पर आपको कोटगढ के सेब के बाग आसानी से दिख जायेंगें। अच्छी क्वालिटी के सेब बहुत होते हैं यहां। सत्यानन्द स्टॉक्स (सैमुअल इवान स्टॉक्स) एक अमरीकी थे जिन्होंने इस क्षेत्र की अर्थव्यवसथा को सुधारने के लिये यहां सेबों की खेती आरंभ की थी। कोटगढ और थानाधार की दूरी नारकंडा से ज्यादा नहीं है। थानाधार भी एक सुंदर जगह है। एक झील भी है इसके आस-पास पर अब उसका नाम याद नहीं आ रहा। नारकंडा में एक पैट्रोल-पंप भी है। इसके बाद पैट्रोल-पंप रामपुर में ही मिलता है। नारकंडा से श्रीखंड महादेव भी साफ दिखाई देता है। उत्तर-पश्चिम दिशा की ओर देखने पर यदि मौसम साफ हो तो श्रीखंड महादेव और कार्तिकेय चोटियां पहाङों की अंतिम कतार में खङी दिखाई देती हैं।

पिंजौर गार्डन (हिमाचल मोटरसाईकिल यात्रा, भाग-01)

फूलों की घाटी का कार्यक्रम रद्द हो जाने की वजह से मन बहुत दुःखी हो गया था। कई कोशिशें करने के बावजूद उत्तराखंड यात्रा बार-बार टल रही थी। इस बार तो ऐन मौके पर जाना रद्द हुआ, बैग तक आधे पैक हो गऐ थे और फिर से उत्तराखंड यात्रा टल गई। मैं खीज गया। तेरी ऐसी की तैसी। एक तू ही है क्या भारत में? उत्तराखंड, अब आऊंगा ही नहीं तेरे यहां। कहीं और चला जाऊंगा। पङा रह अपनी मरोङ में। फटाफट हिमाचल का प्रोग्राम बना डाला। हिमाचल की कई जगहें मेरी टारगेट-लिस्ट में शामिल थीं। शिपकी-ला, किब्बर, प्राचीन हिन्दुस्तान-तिब्बत रोड, एन.एच. 05, काज़ा आदि। कुछ बौद्ध मठों को भी साथ में देखने का कार्यक्रम बनाया और एक लंबी दूरी की मोटरसाईकिल यात्रा फिक्स हो गई।

यात्रा-प्रोग्राम

तय कार्यक्रम की एक झलक नीचे दिखा रहा हूँ।
पहला दिनः पिंजौर गार्डन देखते हुये शिमला तक और आगे प्राचीन हिन्दुस्तान-तिब्बत रोड से होते हुये रामपुर तक।
दूसरा दिनः कल्पा, रोघी देखते हुये सांगला घाटी और छितकुल तक।
तीसरा दिनः शिपकी-ला देखते हुये दुर्गमतम एन.एच. 05 से होते हुये गियू, नाको, धनकर और ताबो मठ घूमकर काजा तक।
चौथा दिनः किब्बर और कीह देखते हुये कुंजम पास, चंद्रा घाटी और रोहतांग पास से होते हुये मनाली तक।
पांचवा दिनः दिल्ली वापस।

उत्तराखंड मोटरसाईकिल यात्रा 2013

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उत्तराखंड मोटरसाईकिल यात्रा (दूसरा दिन)
कल उत्तराखंड की अपनी शुरूआत ही बारिश में की थी। बारिश भी ऐसी कि सुबह चार बजे बहादुरगढ से निकले हुऐ हम मोटरसाईकिल सवार 260 किलोमीटर दूर हरिद्वार तक एक दिन में भी नहीं पहुँच सके। दो किलोमीटर पहले ज्वालापुर में ही रूकना पङा। आज सवेरे जब छः बजे उठे तब भी बारिश जारी थी। मैं 16 जनवरी 2015 का सवेरा देख रहा था। इस बात से बिल्कुल बेखबर कि आज पहाङ पर मुसीबतों का पहाङ टुटने वाला है। वैसे तो उत्तराखंड में पिछले कुछ दिनों से लगातार ही बारिश हो रही थी पर आज सैलाब आने वाला था। आठ बजे तक मैं अपने नित्य कार्यों से निपट चुका था। सुँदर और कल्लू को भी जगा दिया कि वे भी निपट लें ताकि जैसे ही मौका मिले, आगे पहाङ के सफर पर निकल पङें। नौ बजे तक हम रेडी-टू-गो हो गऐ। लेकिन वर्षा रूकने के कोई आसार नहीं। धर्मशाला वालों से इस बात की भनक हमें मिल चुकी थी कि ऊपर पहाङों पर भी लगातार जबरदस्त बारिश चल रही है। एक बार यह भी विचार आया कि अबकी बार उत्तराखंड यात्रा रद्द कर देते हैं और घर लौट चलते हैं। विचार-विमर्श चल ही रहा था कि मूसलाधार बारिश चमत्कारी ढंग से रूक गई। बादल छँटे तो नहीं थे पर पानी की एक बूँद तक नहीं गिर रही थी। मैं आगे जाना चाहता था। साथी भी पीछे नहीं हटे। धर्मशाला वालों को पचहतर रूपऐ दिये और मोटरसाईकिल स्टार्ट कर आगे बढ चले। सङक पर आते ही भंयकर रूप से हुई बारिश का परिणाम देखने को मिल रहा था। जगह-जगह पानी भरा हुआ था। ज्वालापुर में स्वामी श्रृद्धानंद चौक के पास उपरी गंग नहर पर एक पुल है। इस पुल के पास वाले घाट पर एक छोटा सा मंदिर है। यह मंदिर गंग नहर में आधे से ज्यादा डूब चुका था। केवल ऊपरी भाग में शेषनाग का फन ही नजर आ रहा था। आगे बढे। बूंदाबांदी फिर शुरू हो गई। हरिद्वार में गंगा तट पर शोभायमान ऊंची शिव प्रतिमा के पास वाले पुल से गंगा को देखा। समुंद्र जैसी विशाल लहरें। एक मोटरसाईकिल के अवशेष भी देखे जिसे गंगा पता नहीं कहां से बहा लाई थी और यहां किनारे पर पटक दिया था। हर की पौङी की तरफ का जायजा भी लिया गया। पानी वाल्मिकी मंदिर में घुसने को उतावला था। धारा के ठीक बीच में विराजित देवी की प्रतिमा का भी कोई नामोनिशान नहीं था। गंगा का वैसा रौद्र रुप आज तक हरिद्वार में मैंने तो इससे पहले नहीं देखा था। हर की पौङी की सीढीयां डूब रही थीं और जीवनदायिनी मां आज चंडी का रूप धारण किये हुऐ थी।

उत्तराखंड मोटरसाईकिल यात्रा 2013 - एक बाईक ट्रिप बारिश में

कौन भूल सकता है उस तबाही को, जो 2013 में उत्तराखंड ने देखी थी। विनाश के उस सागर के तट पर उन दिनों मैं भी तो था। गंगा का वैसा रौद्र रुप आज तक हरिद्वार में मैंने तो इससे पहले नहीं देखा था। हर की पौङी की सीढीयां डूब रही थीं और गंगा के ठीक बीच में विराजित देवी की प्रतिमा का कोई नामोनिशान नहीं था।

तो दोस्तों, आपको ले चलता हुँ 2013 के उन्हीं विनाशकारी दिनों में मोटरसाईकिल से की गई अपनी हिमालय यात्रा पर।

शिमला यात्रा - दिल्ली से शिमला (प्रथम दिन)

हिमालय भारत का ताज है। ताज क्या राजा है राजा। जैसे राजाओं की कई-कई रानियां होती हैं, वैसे ही हिमालय के पहाङों की भी कई रानियां हैं। जैसे- मसूरी, शिमला आदि आदि आदि। तो जी 2012 के सितंबर माह में जब पहाङों की रानी शिमला का कार्यक्रम बन गया। सोचा वाहन भी कुछ राजसी झलक वाला होना चाहिऐ। अब मैं ठहरा बोद्दे हिसाब-किताब का माणस। जहाज में तो जा ना सकता। हिमालयन क्वीन का आरक्षण करा डाला। धुर शिमला तक कन्फर्म बर्थ भी मिल गई। हो गऐ शाही ठाठ। आराम से पैर पसार कर सफ़र करेंगें। ट्रेन का अंदाज़ राजसी ना सही, नाम तो है। अब महाराज हिमालय की रानी शिमला तक रानी ट्रेन से यात्रा करेंगें।

वैष्णों देवी यात्रा – जम्मू से दिल्ली

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कल रात में हम सब भैंरो बाबा के मंदिर पहुँच गऐ थे और दर्शन करने के बाद वहीं धर्मशाला में रुक गऐ थे। आज सुबह जाग उठने के बाद हल्का-फुल्का नाश्ता किया और वापसी की सुरती भर दी। रात को आराम करने को मिल गया था तो अब थकान ना के बराबर थी। अपने-अपने झोले उठाऐ और कटरा के लिऐ उतराई शुरु कर दी। आज की देर रात जम्मू से दिल्ली तक नवयुग एक्सप्रेस में हमारा आरक्षण था। कोई जल्दी नहीं थी। इसलिऐ आराम से प्रकृति के नज़ारे लेते हुऐ चल रहे थे जबकि माताजी और पिताजी चाहते थे कि फटाफट कटरा पहुँच कर शाम तक आराम की नींद ली जाऐ। कुछ देर हम तीनों (मैं, मेरी पत्नी मनीषा और मेरा अनुज बंटी) उनके साथ अनमने मन से जल्दी-जल्दी उतरते रहे। पर आखिर इतनी मनमोहक दृश्यावलियों को दिल में बसाऐ बिना कैसे हम यूँ ही जाकर कंक्रीट की चारदीवारियों में जा पङें। यह तो घुमक्कङी धर्म के विपरित भी हुआ। शीघ्र ही बग़ावत कर दी गई। जनक पार्टी से कह दिया गया कि आप चल कर आराम करें, हम आराम से घुमते हुऐ अपने आप आ जाऐंगे। उनके जाने के बाद तो हम अपनी मर्जी के मालिक थे। जहां चाहें जितनी देर चाहें घुमने को स्वतंत्र थे। जाहिर है इस आजादी का खूब फ़ायदा भी उठाया गया। प्राकृतिक दृश्यों का खूब आनंद लूटते हुऐ, फोटो क्लिक करते हुऐ लगभग छह घंटों में हम कटरा पहुँचे थे। इसमें भी ज्यादातर वक्त तो अर्धकवारी से उपर ही बीत गया। जबकि चढाई के दौरान हमने बमुश्किल चार घंटे का समय लिया था। वो भी तब जबकि माताजी के घुटनों में दर्द रहता है।

वैष्णों देवी यात्रा – कटरा से भैंरो मंदिर

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रात डेढ बजे के लगभग ट्रेन में सवार होने के बाद हम सारे सो गऐ थे। और जब सवेरे आँख खुलीं तो किला रायपुर निकल रहा था। किला रायपुर, पंजाब का यह गांव दुनियां में मशहूर है। इसकी मशहूरी की ख़ास वजह है यहां सालाना होने वाला खेल महोत्सव। आम मनोरंजक खेलों से लेकर साहस भरे अनगिनत खेलों का आयोजन किया जाता है। जांबाज सिक्ख लङाकों का प्रदर्शन देखते ही बनता है। ख़ैर किला रायपुर को फिर कभी के लिऐ रख छोङते हैं और वैष्णों माई की अपनी यात्रा पर आगे बढते हैं। जागने के बाद पहला बङा स्टेशन आया- लुधियाना। यह शहर किसी परिचय का मोहताज नहीं है। लुधियाना उत्तर रेलवे का बहुत बङा जंक्शन है। यहां से एक लाईन चंडीगढ की ओर जाती है। एक लाईन जाती है हरियाणा के जाखल की ओर, जिससे हम आऐ हैं। फाज़िल्का और अटारी के लिऐ भी यहां से रेलवे लाईन जाती हैं। ये लाईनें भारत-पाकिस्तान बॉर्डर की ओर जाती हैं। अटारी तो आप जानते ही होंगें। अटारी वाली लाईन वाघा होते हुऐ सीमा पार करके आगे पाकिस्तान में लाहौर तक भी जाती हैं। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इसी लाईन पर वर्ष 2000 के दशक में समझौता एक्सप्रेस चलाई थी। लुधियाना से ही एक सिंगल ट्रेक पंजाब के एक और शहर लोहिया खास की ओर जाता है।

वैष्णों देवी यात्रा (सपरिवार) - प्रस्थान दिवस

आज का समय कुछ ऐसा चल रहा है कि यदि आप किसी इंसान से निःस्वार्थ प्रेम करते हैं और इस प्रेम का इज़हार भी करते रहते हैं तो बहुधा सामने वाला यह समझने लगता है कि आप जरुर कोई स्वार्थ साधना चाहते हैं। आप स्वयं बारीकी से गौर करके देख लीजिऐ, लगभग हर जगह कुछ ऐसा ही चल रहा है। आज के व्यवसायिक माहौल में यह बिल्कुल आम हो चला है। अगर आप किसी से प्रेम करते हैं या आपके मन में किसी के प्रति लगाव है तो कोई जरुरी नहीं कि आपको बदले में प्रेम ही मिले। अब धोखा मिलने के चांस बढ गऐ हैं। लेकिन ऐसा केवल इंसानों के केस में है, जानवर आज भी वहीं हैं जहां प्रकृति ने उन्हें छोङा था। ये बेचारे इंसान की तरह अपना विकास नहीं कर पाऐ।

- गर्मियों के दिनों में जब सबकुछ सूखने लगता है, अपने घर में छांव में कहीं पर मिट्टी के एक तौले या बर्तन में पानी भर कर रखना शुरु कर दें। आपको बर्ड वाचिंग के लिऐ जंगलों में नहीं जाना पङेगा। कुछ ही दिनों में पंछियों की चहचहाहट से घर भर जाऐगा। हां घर वालों की डांट भी पङ सकती है क्योंकि आपके साथ रहने के लिऐ ये पंछी कुछ तिनके उठा लाऐंगें जो घर में फैल सकते हैं। और फिर घर खराब दिखेगा।
- आप राह चलती किसी प्यासी गाय को एक बाल्टी पानी पिला दीजिऐ और घर में वापस घुसने की बजाय जरा देर के लिऐ के लिऐ उसके शरीर को सहला दीजिऐ। आपकी प्रेम-दीवानी होकर अपनी खुरदरी जीभ से आपको चाटना शुरु कर देगी। अपने माथे से आपकी कमर पर रगङना शुरु कर देगी। तभी कोई इंसान भागा-भागा आऐगा और प्रवचन शुरु कर देगा- भगा दे इसनै। दुण (टक्कर) मार देगी। चल। हौ। है।
- एक ताज़ी जच्चा बिल्ली, जिसका दुध ही उसके बिलौटे का एक मात्र आहार है, उसके सामने थोङा सा दुध अपने हिस्से में से निकाल कर रखना शुरु कर दीजिऐ। कुछ ही दिनों में आपके पैरों से खुद को रगङना शुरु कर देगी। हां घर वालों की डांट भी पङेगी वो अलग बात है।

शिलांग यात्रा (गुवाहाटी से दिल्ली)

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पूर्वोत्तर भारत में तीन दिन बिताने के बाद मैं अब वापस घर की ओर रुख़ कर चुका हुँ। दिल्ली से चलने के बाद मुझे गुवाहाटी पहुँचने में दो दिन लगे थे। अब इतना ही वक्त वापस घर पहुँचने में भी लगेगा। कुल मिलाकर पूर्वोत्तर भारत की इस यात्रा में सात दिन लगे मुझे। इस यात्रा के अनुभवों को आपके साथ सांझा किया। अगर आप भी मेरी तरह फक्कङ घुमक्कङ हैं तो उम्मीद है ये अनुभव आपके भी कुछ काम आ जाऐंगें। आपके भी सुझावों का स्वागत है।

वापसी के सफ़र ने काफी परेशान किया। सीट कन्फर्म थी फिर भी सफ़र का एक बङा हिस्सा खङे खङे तय किया। असल में गरमी और भीङ बहुत थी। ऊपर से यू.पी., बिहार। कोई इन राज्यों से हो तो माफ करना पर आप भी जानते हैं कि यहां से गुजरने वाली ट्रेनों की पान और पसीने की दुर्गंध से कैसी दुर्गति होती है। खासकर बिहार और पूर्वी यू.पी. में। सच तो सच ही होता है, भले ही बुरा लगे। मैं गरमी कम ही सहन कर पाता हुँ। कुछ लोग इसे मेरी कमी कह सकते हैं। मगर क्या करुं भई। मैं तो खुद मजबूर हुँ। घर वापसी के सफ़र में जब ज्यादा परेशान हो जाता था तो ऐ.सी. डिब्बे के दरवाजे के पास आकर खङा हो जाता था। इसे जरा सा खोलकर कई-कई देर तक खङा रहता था, खङा रहता था। डिब्बे के अंदर से बङी ठंडी-ठंडी हवा आती थी। अब सोचता हुँ कि परेशान तो हुआ पर इस तरह किराऐ के दो हजार से भी ज्यादा रुपिऐ बचा लिऐ। अगर थर्ड ऐ.सी. का टिकट भी लेता तो आने-जाने के पंद्रह सौ-पंद्रह सौ के टिकट लगते। स्लीपर में तो पाँच-पाँच सौ से भी कम लगे।

कामाख्या देवी मन्दिर, गुवाहाटी (शिलांग यात्रा - पाँचवां दिन)

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बरसों से चले आ रहे धार्मिक कलह को आगे बढाने का मेरा यहां कोई इरादा नहीं है। अगर किसी की भावनाऐं आहत हों तो मुझे माफ़ कीजिऐगा, लेकिन स्थापित सत्य से कोई भी इसांन, चाहे वो किसी भी मजहब से ताल्लुक रखता हो, मुकर नहीं सकता है। हिन्दु धर्म में अन्य धर्मों की तरह भले ही बहुत से अंधविश्वास और कुरीतियां हो लेकिन युगों से फल-फूल रही इस सनातन विचारधारा ने कुछ ऐसे मापदंडों, नियमों और रीतियों-नीतियों को विकसित किया है जिनका यदि दृढता के पालन किया जाऐ तो जीवन के चारों आश्रम बहुत सहजता से व्यतीत हो जाऐगें, बेखटके। यकीनन इन्हें जीवन के कुशल संचालन हेतु ही बनाया गया है जो यदि टुटते हैं तो प्रतिफल के रुप में दुख ही मिलता है, फिर चाहे ये भगवान से टुटें या इंसान से। हिन्दु धर्म के अनेक नियमों में वे कसम भी शामिल हैं जो पडिंत महाराज आपको विवाह के फेरों की रस्म के समय खिलाता है। याद कीजिऐ इनमें पत्नी को एक कसम खिलाई जाती है कि अपने पति की आज्ञा के बिना वो कहीं नहीं जाऐगी यहां तक कि मायके भी नहीं। खटपट शुरु ही तब होती है जब पति-पत्नी इन खाई हुई कसमों की उल्टी शुरु कर देते हैं अर्थात इनका पालन नहीं करते। इंसानों का हाल तो आप सर्वत्र देख ही रहे हैं लेकिन जब ईश्वर तक इन नियमों को तोङते हैं तो रिज़ल्ट क्या निकलते हैं इसका एक प्रत्यक्ष प्रमाण तो भारतीय उपमहाद्वीप में जगह-जगह बिखरे शक्तिपीठ ही हैं।