भूतो का गढ - भानगढ | राजस्थान मोटरसाईकिल यात्रा

इस कङी में पढिऐ राजस्थान के भुतहा समझे जाने वाले भानगढ किले का यात्रा-वृतांत

18 जुलाई 2015 यानि शनिवार के दिन मैं, सुंदर और कल्लू बारिश में भीगते हुऐ खेतों की ओर निकल गऐ। कुछ देर इधर-उधर की बातें हुईं। फिर मैं कहने लगा कि यार पंजों में बङी बेचैनी महसुस हो रही है। बहुत दिनों से कहीं घुमने का कार्यक्रम नहीं बना है। चलो कहीं चलते हैं। हालांकि सुंदर जुन में ही पत्नी और बच्चों के साथ मसूरी घूम कर आया था। अब फिर से कहीं चलने की बात उठी तो पठ्ठा फटाक से फिर तैयार हो गया। कल्लू की हमेशा से आदत रही है कि जब भी कहीं घुमने चलने की बात होती है तो बंदा ऐसे रिएक्ट करता है जैसे केवल घुमक्कङी के लिऐ ही उसका जन्म हुआ है। कहता है – अरै यार, ये भी कोई पुछने की बात है। कभी भी चलो। हालांकि इस कभी भी चलने का मतलब होता है कि कभी भी मत चलो। एक बार जोश से भर जाने के बाद जल्द ही उसकी हवा निकल जाती है और जैसे-जैसे वक्त नजदीक आने लगता है, टालमटोल के उसके नऐ-नऐ बहाने निकलने लगते हैं। कल्लू महाराज पक्के सरकारी नौकर हैं। नौकरी पर कम ही जाते हैं। लेकिन जब हम कहीं घुमने का कार्यक्रम बना रहे हों तब तो उन्हें नौकरी पर जाना ही जाना होता है, अन्यथा देश की व्यवसथा खतरे में पङ सकती है। सुंदर की छुट्टी मंगलवार की होती है। उसकी ड्यूटी का कुछ ऐसा चल रहा है कि इसी एक दिन से ज्यादा छुट्टी वो कर नहीं सकता। उसका ड्यूटी-टाईम है दोपहर एक बजे से रात दस बजे तक। मैं मोटरसाईकिल से जाना चाहता था और नाईट-ड्राईविंग भी नहीं करना चाहता था। तो इस प्रकार हमारे पास मंगलवार (21-07-2015) का पुरा दिन और बुधवार का आधा दिन था। बुधवार दोपहर तक हर हाल में सुंदर को ड्यूटी पर पहुँचना था।

शिमला यात्रा - दिल्ली से शिमला (प्रथम दिन)

हिमालय भारत का ताज है। ताज क्या राजा है राजा। जैसे राजाओं की कई-कई रानियां होती हैं, वैसे ही हिमालय के पहाङों की भी कई रानियां हैं। जैसे- मसूरी, शिमला आदि आदि आदि। तो जी 2012 के सितंबर माह में जब पहाङों की रानी शिमला का कार्यक्रम बन गया। सोचा वाहन भी कुछ राजसी झलक वाला होना चाहिऐ। अब मैं ठहरा बोद्दे हिसाब-किताब का माणस। जहाज में तो जा ना सकता। हिमालयन क्वीन का आरक्षण करा डाला। धुर शिमला तक कन्फर्म बर्थ भी मिल गई। हो गऐ शाही ठाठ। आराम से पैर पसार कर सफ़र करेंगें। ट्रेन का अंदाज़ राजसी ना सही, नाम तो है। अब महाराज हिमालय की रानी शिमला तक रानी ट्रेन से यात्रा करेंगें।

वैष्णों देवी यात्रा – जम्मू से दिल्ली

इस यात्रा-वृतांत को शुरु से पढने के लिऐ यहां क्लिक करें

कल रात में हम सब भैंरो बाबा के मंदिर पहुँच गऐ थे और दर्शन करने के बाद वहीं धर्मशाला में रुक गऐ थे। आज सुबह जाग उठने के बाद हल्का-फुल्का नाश्ता किया और वापसी की सुरती भर दी। रात को आराम करने को मिल गया था तो अब थकान ना के बराबर थी। अपने-अपने झोले उठाऐ और कटरा के लिऐ उतराई शुरु कर दी। आज की देर रात जम्मू से दिल्ली तक नवयुग एक्सप्रेस में हमारा आरक्षण था। कोई जल्दी नहीं थी। इसलिऐ आराम से प्रकृति के नज़ारे लेते हुऐ चल रहे थे जबकि माताजी और पिताजी चाहते थे कि फटाफट कटरा पहुँच कर शाम तक आराम की नींद ली जाऐ। कुछ देर हम तीनों (मैं, मेरी पत्नी मनीषा और मेरा अनुज बंटी) उनके साथ अनमने मन से जल्दी-जल्दी उतरते रहे। पर आखिर इतनी मनमोहक दृश्यावलियों को दिल में बसाऐ बिना कैसे हम यूँ ही जाकर कंक्रीट की चारदीवारियों में जा पङें। यह तो घुमक्कङी धर्म के विपरित भी हुआ। शीघ्र ही बग़ावत कर दी गई। जनक पार्टी से कह दिया गया कि आप चल कर आराम करें, हम आराम से घुमते हुऐ अपने आप आ जाऐंगे। उनके जाने के बाद तो हम अपनी मर्जी के मालिक थे। जहां चाहें जितनी देर चाहें घुमने को स्वतंत्र थे। जाहिर है इस आजादी का खूब फ़ायदा भी उठाया गया। प्राकृतिक दृश्यों का खूब आनंद लूटते हुऐ, फोटो क्लिक करते हुऐ लगभग छह घंटों में हम कटरा पहुँचे थे। इसमें भी ज्यादातर वक्त तो अर्धकवारी से उपर ही बीत गया। जबकि चढाई के दौरान हमने बमुश्किल चार घंटे का समय लिया था। वो भी तब जबकि माताजी के घुटनों में दर्द रहता है।

वैष्णों देवी यात्रा – कटरा से भैंरो मंदिर

इस यात्रा-वृतांत को शुरु से पढने के लिऐ यहां क्लिक करें

रात डेढ बजे के लगभग ट्रेन में सवार होने के बाद हम सारे सो गऐ थे। और जब सवेरे आँख खुलीं तो किला रायपुर निकल रहा था। किला रायपुर, पंजाब का यह गांव दुनियां में मशहूर है। इसकी मशहूरी की ख़ास वजह है यहां सालाना होने वाला खेल महोत्सव। आम मनोरंजक खेलों से लेकर साहस भरे अनगिनत खेलों का आयोजन किया जाता है। जांबाज सिक्ख लङाकों का प्रदर्शन देखते ही बनता है। ख़ैर किला रायपुर को फिर कभी के लिऐ रख छोङते हैं और वैष्णों माई की अपनी यात्रा पर आगे बढते हैं। जागने के बाद पहला बङा स्टेशन आया- लुधियाना। यह शहर किसी परिचय का मोहताज नहीं है। लुधियाना उत्तर रेलवे का बहुत बङा जंक्शन है। यहां से एक लाईन चंडीगढ की ओर जाती है। एक लाईन जाती है हरियाणा के जाखल की ओर, जिससे हम आऐ हैं। फाज़िल्का और अटारी के लिऐ भी यहां से रेलवे लाईन जाती हैं। ये लाईनें भारत-पाकिस्तान बॉर्डर की ओर जाती हैं। अटारी तो आप जानते ही होंगें। अटारी वाली लाईन वाघा होते हुऐ सीमा पार करके आगे पाकिस्तान में लाहौर तक भी जाती हैं। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इसी लाईन पर वर्ष 2000 के दशक में समझौता एक्सप्रेस चलाई थी। लुधियाना से ही एक सिंगल ट्रेक पंजाब के एक और शहर लोहिया खास की ओर जाता है।

वैष्णों देवी यात्रा (सपरिवार) - प्रस्थान दिवस

आज का समय कुछ ऐसा चल रहा है कि यदि आप किसी इंसान से निःस्वार्थ प्रेम करते हैं और इस प्रेम का इज़हार भी करते रहते हैं तो बहुधा सामने वाला यह समझने लगता है कि आप जरुर कोई स्वार्थ साधना चाहते हैं। आप स्वयं बारीकी से गौर करके देख लीजिऐ, लगभग हर जगह कुछ ऐसा ही चल रहा है। आज के व्यवसायिक माहौल में यह बिल्कुल आम हो चला है। अगर आप किसी से प्रेम करते हैं या आपके मन में किसी के प्रति लगाव है तो कोई जरुरी नहीं कि आपको बदले में प्रेम ही मिले। अब धोखा मिलने के चांस बढ गऐ हैं। लेकिन ऐसा केवल इंसानों के केस में है, जानवर आज भी वहीं हैं जहां प्रकृति ने उन्हें छोङा था। ये बेचारे इंसान की तरह अपना विकास नहीं कर पाऐ।

- गर्मियों के दिनों में जब सबकुछ सूखने लगता है, अपने घर में छांव में कहीं पर मिट्टी के एक तौले या बर्तन में पानी भर कर रखना शुरु कर दें। आपको बर्ड वाचिंग के लिऐ जंगलों में नहीं जाना पङेगा। कुछ ही दिनों में पंछियों की चहचहाहट से घर भर जाऐगा। हां घर वालों की डांट भी पङ सकती है क्योंकि आपके साथ रहने के लिऐ ये पंछी कुछ तिनके उठा लाऐंगें जो घर में फैल सकते हैं। और फिर घर खराब दिखेगा।
- आप राह चलती किसी प्यासी गाय को एक बाल्टी पानी पिला दीजिऐ और घर में वापस घुसने की बजाय जरा देर के लिऐ के लिऐ उसके शरीर को सहला दीजिऐ। आपकी प्रेम-दीवानी होकर अपनी खुरदरी जीभ से आपको चाटना शुरु कर देगी। अपने माथे से आपकी कमर पर रगङना शुरु कर देगी। तभी कोई इंसान भागा-भागा आऐगा और प्रवचन शुरु कर देगा- भगा दे इसनै। दुण (टक्कर) मार देगी। चल। हौ। है।
- एक ताज़ी जच्चा बिल्ली, जिसका दुध ही उसके बिलौटे का एक मात्र आहार है, उसके सामने थोङा सा दुध अपने हिस्से में से निकाल कर रखना शुरु कर दीजिऐ। कुछ ही दिनों में आपके पैरों से खुद को रगङना शुरु कर देगी। हां घर वालों की डांट भी पङेगी वो अलग बात है।

शिलांग यात्रा (गुवाहाटी से दिल्ली)

इस यात्रा-वृतांत को शुरु से पढने के लिऐ यहां क्लिक करें

पूर्वोत्तर भारत में तीन दिन बिताने के बाद मैं अब वापस घर की ओर रुख़ कर चुका हुँ। दिल्ली से चलने के बाद मुझे गुवाहाटी पहुँचने में दो दिन लगे थे। अब इतना ही वक्त वापस घर पहुँचने में भी लगेगा। कुल मिलाकर पूर्वोत्तर भारत की इस यात्रा में सात दिन लगे मुझे। इस यात्रा के अनुभवों को आपके साथ सांझा किया। अगर आप भी मेरी तरह फक्कङ घुमक्कङ हैं तो उम्मीद है ये अनुभव आपके भी कुछ काम आ जाऐंगें। आपके भी सुझावों का स्वागत है।

वापसी के सफ़र ने काफी परेशान किया। सीट कन्फर्म थी फिर भी सफ़र का एक बङा हिस्सा खङे खङे तय किया। असल में गरमी और भीङ बहुत थी। ऊपर से यू.पी., बिहार। कोई इन राज्यों से हो तो माफ करना पर आप भी जानते हैं कि यहां से गुजरने वाली ट्रेनों की पान और पसीने की दुर्गंध से कैसी दुर्गति होती है। खासकर बिहार और पूर्वी यू.पी. में। सच तो सच ही होता है, भले ही बुरा लगे। मैं गरमी कम ही सहन कर पाता हुँ। कुछ लोग इसे मेरी कमी कह सकते हैं। मगर क्या करुं भई। मैं तो खुद मजबूर हुँ। घर वापसी के सफ़र में जब ज्यादा परेशान हो जाता था तो ऐ.सी. डिब्बे के दरवाजे के पास आकर खङा हो जाता था। इसे जरा सा खोलकर कई-कई देर तक खङा रहता था, खङा रहता था। डिब्बे के अंदर से बङी ठंडी-ठंडी हवा आती थी। अब सोचता हुँ कि परेशान तो हुआ पर इस तरह किराऐ के दो हजार से भी ज्यादा रुपिऐ बचा लिऐ। अगर थर्ड ऐ.सी. का टिकट भी लेता तो आने-जाने के पंद्रह सौ-पंद्रह सौ के टिकट लगते। स्लीपर में तो पाँच-पाँच सौ से भी कम लगे।

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...