प्रथम स्वछंद (साईकिल) यात्रा — भाग 'दो'

सितंबर 07, 2002 (दूसरा दिन)

उसे जागना तो नहीं कह सकते। जब रातभर सोऐ ही नहीं तो सवेरे जागना कैसा? उठे और कोठे से बाहर हम आये। पास बहते रजबाहे में मुंह धोया और इधर-उधर दृष्टि घुमाई। उस सुबह की शोभा का क्या कहना है! सूर्योदय से पूर्व जो लाल ओढ़नी आकाश ओढ़े रहता है वह लालिमा, पृथ्वी पर चारों ओर फैले हरियाली के दुशाले से संयोग कर तिरंगे का भान कराती थी। कितनी ही चिडियाऐं सुप्त प्राणियों को जगाने को चिंहुक रहीं थीं। यमुना तीर की सीलक देह के खुले रोओं से भीतर घुली जाती थी। उस भले वातावरण में मुझे माता की याद आई तो ह्रदय में हूक उठी। मां ही क्या, क्या घरवाले रात्रिभर चैन पाए होंगे? अब तक तो न जाने कहाँ ढूंढ पड गई होगी? परिजनों के पैर इधर से उधर न जाने कहाँ कहाँ दौड़ते फिरते होंगे? बुद्धि अवश्य ही बोध त्याग चुकी होगी। हम यह सब सोच कर अपने ही में छटपटाते थे। अपराध-बोध का भी ग्रास बने जाते थे। परंतु विश्व-दर्शन को यह कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी।


स्नेह-बंधन तोड़कर अपने मार्ग पर आगे बढ़ जाना ही घुमक्कड़ पंथ के धारक का धर्म है। हमने भी तब अपनी झोला-झंडी साइकिलों पर लादी और कोठरे को छोड़ सड़क पर आ गये। इस सड़क पर गढ़ मिरकपुर हरियाणा का अंतिम गांव है और यमुना के किनारे ही है। यमुना के उस पार उत्तर प्रदेश है। जलौढ के इस इलाके में यमुना का रेत सोना उगलता है जिसे बटोरने के लिए दोनों प्रदेशों के सीमावर्ती किसान किसी भी मौसम में खेतों को खाली नहीं छोड़ते। ये और बात है कि यमुना का पानी जब-तब अपना मार्ग बदलता रहता है और खेती की इन जमीनों के लिए खूनी संघर्ष होते रहते हैं। जाजल, बङौली, गोला, निवाङा आदि कितने ही गांवों के लालों के खून से यमुना की मिट्टी लाल हो चुकी। सुना है यहाँ वो दिन भी आये हैं जब संगीनों के साये में जुताई हुईं हैं और पुलिस के पहरे में लामणी। लोग कटकर मरने को तैयार हैं लेकिन मजाल क्या कि जमीन का एक टुकड़ा भी गैरकाबू हो जाऐ।

कंक्रीट के भारी-भरकम पुल से यमुना को पार करके जा पहुंचे उत्तर प्रदेश में गौरीपुर तिराहे पर, जिसे हरियाणा मेें बहुधा ग्रामीण लोग गौरीपुल या गौरी का पुल भी कहते हैं, खासतौर पर सावनी कांवड़ के दिनों में। इस पुल की बात यह है कि सरकार अंग्रेजी के वक्त भी यह मौजूद था। अंतर यह है कि तब यह किश्तियों से तैयार था। 1857 के विद्रोह में इसी से होकर मेरठ छावनी की अंग्रेजी सेना पानीपत पहुंचीं थीं जहाँ विद्रोह की अग्नि भभक रही थी। बेशक इस पुल को बागी नुकसान करते तो बगावत की तसवीर कुछ अलग होती क्योंकि तब नदियों पर बने पुल इफरात में न होते थे। किंतु रियासत-ए-जींद की एक सैनिक टुकड़ी ने इसकी रक्षा की। हालांकि महीने भीतर ही पुल को बागियों ने तोड़ डाला था जिसे की तीन ही दिन के भीतर पुनः बना कर तैयार कर दिया गया था। उस समय में जींद के राजा जाट नरेश श्री स्वरूप सिंह जी होते थे जिन्होंने बडे बवंडर के बीच एक अनाथ हो चुकी भारतीय रियासत को संभाला था। (पढ़ें: जींद रियासत का इतिहास)

गौरीपुर तिराहे से एक सङक गई छोटे-से बागपत की ओर और एक बङे-से मुज़फ़्फ़रनगर की ओर। हम बढ़े मुजफ्फरनगर वाली पर जो आगे हरिद्वार भी जाती थी। जमना पार करते ही थोड़े से घेवर का स्वाद चखा था। लग तो रहा था बासी, वो भी न जाने कितने दिनों का, पर जिह्वा ऐसी लपलपाई कि कुछ सोचने का मौका मिलता उससे पहले पावभर घेवर पेट में पहुँच चुका था। अगले गांव सरुरपुर से निकलते-निकलते हालत ऐसी हो गई कि घेवर जिस रास्ते पेट में पहुंचा था उसी रास्ते बाहर निकल आया। फर्क बस इतना था कि अंदर जाते समय तो मिठास लिए हुए था और बाहर आते वक्त खटास, थनथनाती खटास। फिर तो दिन भर ऐसी उबकाईयां आईं कि तिमाहे-चौमाहे की कोई गर्भधारिणी ही जान सकती है। दोपहर होते होते बङौत पहुँच गये। उन दिनों बङौत में बाईपास नहीं होता था। नगर की तंग सङकों से होकर ही इसे पार किया जाता था। बङौत में जो अनोखी चीजें देखने में आईं वो थीं पशु की जगह इंसान को जोत कर खींचे जाने वाले छोटे ठेले और सङक-डिवाइडर पर गाङे गये लैंप-पोस्ट। ये लैंप-पोस्ट न केवल खूबसूरती से मोल्ड किए हुए थे बल्कि इन पर गुलदान भी लटके हुए थे। आश्चर्य की बात कि धूल-धूसरित गुलदानों में फूल भी खिले हुए थे। उस अस्त-व्यस्त शहर में कौन उन्हें पानी देता होगा? या यह सावन की फुहारों का कमाल है। किशोर अवस्था में यूं भी चीजें नईं तो लगती ही हैं, बहुत सीं आश्चर्यचकित भी कर देतीं हैं। बङौत शहर को हम पहिली दफे देख रहे थे।

बङौत से मुजफ्फरनगर जाने के लिए हमने वाया बुढ़ाना सङक पकङी, हालांकि शामली होकर भी जाते हैं। तब यह सङक इतनी चौड़ी नहीं होती थी। आमने सामने से अगर दो मोटर-बसें आ जातीं तो दोनों को अपनी कडंक्टर साइड सङक से नीचे उतारनी ही पङतीं। इस पर भी मजाल जो इंजन पर पंजे का दबाव जरा भी कम हो जाये। यू.पी. में पैर की जगह ईंट रखके बस चलाने की प्रथा है क्या? इसी तरह चलते हुए एक छोटे से ईंट भट्ठे के पास पहुंचे। देखने में यह कामबंद मालूम होता था। दोपहर हो चुकी थी तो उसके खुले बरामदे में रोटी पकाने का उपक्रम किया। रसोई हम बिलकुल नहीं जानते थे-न अब ही जानते हैं-सो सुंदर ही ने बरतन बेलन संभाले। चार ईंट खड़ी कर आग धौंकी और रोटियों की तैयारी शुरु हो गई। तब तक वहां कोठे की छत पर चढ़ कर देखने हम चले गये। छत से इधर-उधर नज़र घुमाई तो क्या देखते हैं कि चहुं ही ओर प्रकृति ने हरियाली की चुनरी ओढ़ रखी है। खेती में तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश की मौज है। सड़क की दोनों बाहों मीलों तक फैले ईंख और धान। पेड़ पौधों के खूब घने झुरमुट। हरे-भरे खेतों की बीच पतली सर्पीली सड़क काली नाग मालूम होती थी। थोड़े समयांतराल पर सुंदर की आवाज़ पर लौटने तक रोटियां पक चुकीं थीं। तरकारी-भाजी की वहां कौन कहे। बोरी में रखा आचार काम आया। यह सब निपटा हम चले।

बेलगाम जमीनी जहाज़ों यानि गैर-सरकारी अंधड़ उड़ाती मोटर-बसों से बचते-बचाते चले जा रहे थे कि फिर से बूंदाबांदी शुरु हो गई, असल में बंद ही कहाँ हुई थी? कभी घनी तो कभी थोड़ी, जब से यात्रा आरंभ हुई, बूंदाबांदी जारी ही रही। जब कन्हेर गांव से निकले ही थे कि मूसलाधार बारिश शुरु हो गई। किसी तरह दौड़ कर गांव के बाहर काली माता के मंदिर में शरण ली। कुछ देर बाद झोले खोल कर देखे। पन्नियों में लिपटे झोले और झोलों में रखे लत्ते-जुत्ते सब पानी-पानी हो गये। जब तक झमाझम बरसता पानी फुहारों में बदला, सांझ भी होने को आई। रात काटने की गरज से मंदिर में इधर-उधर ताक-झांक हमने की। एक कमरे की कच्ची धर्मशाला मिली जिसकी छत में से आसमान में छाये घने बादल दिख रहे थे। देवी की मूर्ति वाला कमरा तालाबंद था। एक कोठरी और दिखी, पर चरमराई हुई। अगर रात में धराशायी हो गई तो अपने साथ हमें भी ले मरेगी। ना, यहाँ नहीं। अब बचा लगभग बीस बाई दस के खुले बरामदे का विकल्प। सुंदर से पूछा तो सुझाव आया कि यू पी में इस तरह वीराने में, आदमी से भी उंचे-उंचे ईंखों के बीच रातभर का जागरण न हो सकेगा। पिछली रात भी हम सोये नहीं और दो दिन से बरसात में साइकिल चला रहे हैं। वास्तव में हम असहाय थे और परेशान हो गये थे।
“तो क्या करें” - हमने पूछा।
उधर से जवाब नदारद।

उकङू बैठ कर माथा घुटनों पर रख लिया और आंखें जमीन में गङा लीं। उंगलियां अपने आप कहीं से कोई तिनका उठा लाईं और मिट्टी कुरेदने लगीं। तभी देवदूत के रुप में कहीं से कोई बूढ़ा आया। सब हाल जानकर हमें सुझाव दिया कि अगले गांव दाहा चले जायें। खाना तो बाद है पर सर छुपाने को छत अवश्य मिल जायेगी, किसी चौपाल में रुक जाना। तुम्हारे कपड़े लत्ते भी सूख जायेगें। बात हमें जंच गई और तुरंत दाहा के लिए दोनों जन तैयार हो गये। मंदिर से निकल कर चले ही थे कि फिर बारिश शुरु हो गई। जल्दी जल्दी पैडल मारकर दाहा गांव पहुँचे और चौपाल की तलाश शुरु हुई। ढुंढते-पूछते गलियों में भटकते रहे। झमाझम की झड़ी में कोई बाहर दिखाई भी तो न देता था। आखिरकार एक अधेड़ गृहस्थ ने बताया: "वो सामणे बी एक चौपाङ है, पर वहां खाट-चारपाई कुछ ना मिलणे की। ऐसी बारिश मं टपकती छत के नीचै रात कैसे गुजारोगे। ऐसा करो, अपणी साइकिल यहीं अंदर ले आओ।"
“आपके घर में”?
“हां, या मेरी पोळी स। घर वो रह्या स्ह्यामी। खाट-पलंग अड़ै कू सं ई, रोटी घरूं सै आ ज्यागी।”

अंधा क्या मांगे, दो आंखें। हम झटपट अंदर घुस लिए। और यहाँ केवल दो नहीं बल्कि बहुत सी आंखें मिलीं। सबसे पहले एक कमरे में-जहाँ ढेरों ईंधन पड़ा हुआ था-एक एक कर अपने सारे कपड़े सुखाने को हम लोगों ने डाल दिये। तत्पश्चात हाथ-मुंह अच्छी तरह धोये। जब यह क्रिया-कलाप जारी थे तब तक गृहस्वामी ने हमारे लिए बडे ही बेहतर प्रबंध कर दिये थे। चौड़े पायों के भारी पलंग बिछ गये थे। इसके साथ-साथ रातभर पहनने को कपड़ा मिला, घी-खांड के साथ तर रोटियां मिलीं, कंपकंपाते हाड़ों को गर्माइश के लिए मोटे कंबल मिले। एक और चीज़ जिसकी बेहद जरूरत हमें थी, ठंड की दवा मिली। सो न पाने, अथक चलने, लगातार बारिश और तूफ़ानी हवाओं ने हमें बीमारू बना दिया था। हमारी सूरत मात्र देख ही कर बीमारी का सहज अंदाजा लगता था। ऐसे में गृहपति ने-रात के खाने के बाद-न मालूम क्या क्या घोंटकर बनाया गया काढ़ा हमें पीने व चाटने को दिया। जो खांसी और सर्दी नाक में दम किए हुए थी वह सुबह तक यूं ग़ायब हुई कि जैसे गधे के सर से सींग। काढ़ा ने हम बेचारों में रात-रात में नई जान फूंक दी थी। कोई भी अंग्रेजी टाॅनिक-भले ही सैंकड़ों रुपयों की कीमत का हो-आज पंद्रह वर्ष बाद भी हमें उस देसी दवा के मुकाबिले का दिख नहीं पाया है।

भारतीय घरेलू नुस्खों को टक्कर न एलोपैथ पहले कभी दे पाया है-और भविष्य में कभी दे देगा-ऐसी सूरत नहीं नजर आती। यह बात अलग है कि घर के जोगी जोगड़े की तरह आयुर्वेद की माकूल कद्र अब अपने मुल्क में नहीं है। जड़ी-बूटियों से तैयार औषध की तो बात ही क्या जबकि बड़े-बूढ़ों के देसी नुस्खे भी कुछ कम क़ाबिले-फ़ख्र नहीं हैं। और आतिथ्य की वह परंपरा जो उन गृहस्थ ने दिखाई वह भी भारतवर्ष में आजकल की नहीं है अपितु हजारों वर्षों से चली आती है। ईसा से सैकड़ों वर्ष पूर्व, जबकि कौड़ियाँ करेंसी का काम दे देती थीं, तब भी यात्रियों को भारतवर्ष में सफर के दरमियान सिक्कों की आवश्यकता लगभग न थी। प्रथम तो गृहस्थों के घर ही अतिथिशाला होते थे, इलावा इसके ग्राम्य-संस्थाएँ व पंचायतें भी अतिथि-गृहों का प्रबंध तैयार रखतीं थीं जिनमें बिस्तर व भोजन का समुचित प्रबंध बाकायदा रहता था। सरकार अंग्रेजी के समय में लिखे गये एतिहासिक ग्रंथ “जाट-इतिहास” में ठाकुर देशराज भी यह बात तसदीक़ करते हैं। वर्तमान में कामकाज से समय बचाकर घुमक्कड़ी करने वाले आधुनिक लौंडे इसे पाश्चात्य “काउचसर्फिंग” की संज्ञा देते हैं जबकि राह चलते राहगीर का किसी गांव-बस्ती में अनजान के घर ठहर जाना और हुक्का-पानी सांझा करना सरकार अंग्रेजी के खूब बाद तक भी भारत में प्रचलित था। ऐसे वृद्ध हो चुके अनेक यात्री समय हाल तक भी जीवित पाये जाते हैं। यमुना किनारे के उत्तर प्रदेशी जाटों में, एवं कहीं-कहीं हरियाणा और राजस्थान में यह रिवाज अभी तक देखने को मिलती है। उफ! परंतु ऐसी गौरवशाली परंपरा भारत से अब उठने के कगार पर है। ग्रामीण हेलियों की इस विरासत को फ्लैट और कोठियाँ खाती जातीं हैं।


अ. प्रथम परवाज़ (हरिद्वार साईकिल यात्रा)
आ. प्रथम परवाज़ (हरिद्वार साईकिल यात्रा) — भाग-एक
इ. प्रथम परवाज़ (हरिद्वार साईकिल यात्रा) — भाग-दो
ई. प्रथम परवाज़ (हरिद्वार साईकिल यात्रा) — भाग-तीन
उ. प्रथम परवाज़ (हरिद्वार साईकिल यात्रा) — भाग-चार
ऊ. प्रथम परवाज़ (हरिद्वार साईकिल यात्रा) — भाग-पाँच
ऋ. प्रथम परवाज़ (हरिद्वार साईकिल यात्रा) — भाग-छह
ए. प्रथम परवाज़ (हरिद्वार साईकिल यात्रा) — भाग-सात
ऐ. प्रथम परवाज़ (हरिद्वार साईकिल यात्रा) — भाग-आठ

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...