हिमाचल मोटरसाईकिल यात्रा (कुल्लू से दिल्ली) भाग-06

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हिमाचल मोटरसाईकिल यात्रा का पांचवा और अंतिम रैन-बसेरा सिद्ध हुआ कुल्लू। कल मैं और रविन्द्र अपनी मोटरसाईकिल को लोसर से एक गाङी में लादकर यहां तक लाये थे और आज दिल्ली (अपने घर) की ओर कूच कर दिया जायेगा। पर उससे पहले चंद बातें कुल्लू के बारे में कर लें। पर्यटन में मनाली के प्रभुत्व के आगे कुल्लू दबा हुआ सा दिखता है। ऐसे सैलानियों की कोई कमी नहीं जो कुल्लू-मनाली घूमने की कहकर घर से निकलते हैं पर मनाली और रोहतांग देखकर वापस हो लेते हैं। जबकि हकीकत तो ये है कि हर तरह के मौसम और हर तरह के सैलानी के लिये इधर का प्रवेश-द्वार कुल्लू ही है। हर दिल अजीज़ रोहतांग, मनाली, मणिकर्ण, नग्गर आदि के बारे में तो सब जानते ही हैं। इन सब के मार्ग कुल्लू से ही निकलते हैं। खीरगंगा, बिजली महादेव, चंद्रखनी, मलाणा जैसे मध्यम दर्जे के ट्रेकों के लिये भी यहीं से मार्ग निकलते हैं। हाई-ऑल्टीट्यूड ट्रेकिंग रूट जैसे सारा-उमगा और हामता पास भी कुल्लू से ही निकलते हैं जो कुंजुंम पास और बारालाचा-ला होते हुये सीधे लद्दाख में पहुँचा देते हैं। और तो और बगैर किन्नौर जाये पिन-पार्वती पास से होकर सीधे स्पीति के गढ काजा तक भी कुल्लू से जाया जा सकता है। कुल्लू स्वयं अपने भीतर अनेक आकर्षण समेटे हुये है। रघुनाथ और श्रृंग ऋषि जैसे अनेक मंदिर हैं, फिशिंग और राफ्टिंग के लिये ब्यास है, बौद्ध मठ भी हैं। कुल्लू का दशहरा तो विश्व-प्रसिद्ध है ही। क्या कुछ नहीं है कुल्लू में?

कल ही तय करके सोये थे कि अब सीधे घर जाकर ही रुकेंगें। सवेरे सात बजे मोटरसाईकिल चलने को तैयार थी और किक लगा दी गई। पहला ठहराव सोचा गया- मंडी। लेकिन कुल्लू से निकलते ही ब्यास घाटी इतने खूबसूरत नजारे पेश करती है कि बिना रुके आप रह नहीं सकते। खासतौर पर हणोगी माता मंदिर के आगे-पीछे के बीस-पच्चीस किलोमीटरों में। जानते थे कि अब जल्द ही गर्मी से रु-ब-रु होना है, पहाङों की सुबह की ठंडी-सुंगधित वायु भी जी भरकर सोख लेना चाहते थे इस पर भी बाईक की गति धीमी न की जा सकी चूंकि रोड एकदम टनाटन है। कई दिनों बाद अच्छी सङक दिखी थी सो मोटरसाईकिल दौङती ही चली गई। फिर कुल्लू से दिल्ली के रुट को एक ही दिन में निपटाने का दबाव भी था। पण्डोह से पहले दो-तीन बार केवल पांच-पांच मिनट ही रुके और उसके बाद बिल्कुल नहीं। पण्डोह के पास औट में भारत की सबसे लंबी सङक सुरंग भी है। कुल्लू-मनाली के लिये इसमें से होकर गुजरना होता है। इसका भी एक अलग ही रोमांच है। सबसे लंबी सुरंग का यह खिताब कभी जम्मू-श्रीनगर हाईवे की जवाहर सुरंग के नाम होता था। जब मंडी के पठानकोट वाले तिराहे पर पहुँचे तो दस बजने वाले थे। यहां रूके तो थे चाय के लिये पर आलू के पराठे भी ऑर्डर कर दिये गये। लेकिन शीशों वाले रेस्त्रां में पराठे खाकर हम तो लुट गये। दो चाय और दो परांठे का बिल बना सौ रुपये। हे राम!

जब पराठे निपटाकर चले तो साढे दस बज गये थे। यहां से निकलने के बाद बीस मिनट के लिये बिलासपुर के पास रूके। पिछवाङा दुखने लगा था और गर्मी शुरु हो गई थी। लेकिन सिवाय चलते रहने के कोई चारा न था। कैमरे को स्थाई आराम दे दिया गया। अब इसे अगली यात्रा में ही कष्ट देंगें। यो भी दुखी हो लिया। एक बजे यहां से चल दिये। बिलासपुर के बाद नौणी से शिमला का रास्ता बायें अलग होकर उपर की ओर चढता है और दायां रास्ता चंडीगढ को जाता है। हमें चंडीगढ जाना था सो दायें मुङ गये। स्वारघाट पहुँचे पर कहीं रूके नहीं। स्वारघाट के आस-पास ही दूर दायें हाथ को पहाङ की चोटी पर नैना देवी का मंदिर काफी आगे तक दिखता रहता है। कीरतपुर आकर निकल गया पर बाईक नहीं रुकी। पीछे से लगातार रुकने के लिये प्रार्थनायें की जा रहीं थीं। पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा था। किसी भी तरह तीन बजे तक चंडीगढ पहुँचना था। धीरे-धीरे प्रार्थनाओं के सुर धमकियों में बदल गये। “या तो मोटरसाईकिल रोककर चाय पिला दे, वरना कूद जाउंगा।” और रुपनगर का मैदानी रोड शुरू होते ही मोटरसाईकिल रोक दी गई। आधे घंटे के लिये रुके और फिर चल दिये। चंडीगढ से तीस किलोमीटर से पहले एक बार फिर पंद्रह मिनट के लिये रूके। जब चंडीगढ पहुँचे सो साढे तीन बज गये थे। चंडीगढ की लाल बत्तियों ने ब्होत परेशान कित्ता सी। जीरकपुर में पैट्रोल भरवा कर चले तो साढे चार बज गये थे। पांच बजे अंबाला पार करके मजेदार शिकंजी-पान किया और बीस मिनट में फिर चल पङे। शाम होने लगी थी और इस वक्त मोटरों को जैसे पंख लग जाते हैं। गौर किया होगा कभी आप लोगों ने कि कोई भी वाहन दिन के बनिस्बत सांझ ढले ज्यादा तेज दौङता है। अंधेरा होते-होते करनाल में इंद्री मोङ पर थे। यहां कढी के साथ एक रोटी मैंनें खाई और तीन रविन्द्र ने। साढे सात बजे करनाल से रुखसत हो कर पानीपत, मुरथल होते हुये जब सवा नौ बजे सोनीपत पार किया तो हो गई एकदम से बत्ती गुल! मोटरसाईकिल की हैडलाइट फ्यूज होकर बंद हो गई और घर अब भी पैंतीस किलोमीटर दूर रहा। कभी इंडीकेटर तो कभी मोबाईल की टार्च जला कर दस बजे आसौदा तक पहुँच गये। यहां दादा बूढे के मंदिर में हाजिरी लगा कर चले तो सवा दस बजे अपने घर जा टिके। खा-पी कै अपणै फटकार कै सोये।

आज घर से कुल्लू की पांच सौ किलोमीटर की दूरी तय करने में पंद्रह घंटे का समय लगा जिसमें कुल मिलाकर तीन घंटे के स्टॉप भी शामिल हैं। यानि पांच सौ किलोमीटर की दूरी करने के लिये एक ही दिन में बारह घंटे की राईडिंग - चालीस किलोमीटर प्रति घंटा की औसत से। वो भी पौने आठ साल पुरानी 125 सीसी बाईक पर दो आदमियों के वजन के साथ। ये इतना आसान नहीं है जितना पढने-सुनने में लगता है।
Kullu Bus Stand, Himachal
हमारे कमरे से दिखता कुल्लू बस स्टैंड।

Room in Kullu
रात का ठिकाना

Beas River Waterfall, Himachal
ब्यास घाटी में एक झरना।

Beas River Waterfall
ब्यास घाटी

Beas River Valley
ब्यास घाटी में मनाली रोड

Hanogi Mata Temple, Himachal Pradesh
रविन्द्र और पीछे दिखता हणोगी माता मंदिर।
यात्रा के अनुभवों का निचोङ अगले भाग में....(स्पीति टूर गाईड)
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1. हिमाचल मोटरसाईकिल यात्रा (दिल्ली से नारकंडा) भाग-01
2. हिमाचल मोटरसाईकिल यात्रा (नारकंडा से कल्पा) भाग-02
3. हिमाचल मोटरसाईकिल यात्रा (कल्पा से चांगो) भाग-03
4. हिमाचल मोटरसाईकिल यात्रा (चांगो से लोसर) भाग-04
5. हिमाचल मोटरसाईकिल यात्रा (लोसर से कुल्लू) भाग-05
6. हिमाचल मोटरसाईकिल यात्रा (कुल्लू से दिल्ली) भाग-06
7. स्पीति टूर गाईड
8. स्पीति जाने के लिये मार्गदर्शिका (वाया शिमला-किन्नौर)
9. स्पीति जाने के लिये मार्गदर्शिका (वाया मनाली)

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