हिमाचल मोटरसाईकिल यात्रा (कल्पा से चांगो) भाग-03

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हिमाचल मोटरसाईकिल यात्रा का तीसरा दिन और मैं किन्नौर में हूँ। किन्नौर में हिमालय की दो बेहद महत्वपूर्ण श्रृंखलाऐं हैं- जांस्कर और वृहद हिमालय। स्पीति की ओर इसके निचले छोर के पास ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क है और उससे कुछ उपर पिन वैली नेशनल पार्क। भाबा, सांगला, बस्पा, रोपा और चरांग जैसी सुरम्य घाटियां किन्नौर के किसी नगीने से कम नहीं। फिर किन्नौर-कैलाश की चार-पाँच दिनी पैदल परिक्रमा तो होती ही है घुमक्कङों की दिली ख्वाहिश। साहसी ट्रेकर खूब रूख करते हैं इनकी तरफ। किन्नौर की हद भारत और तिब्बत के बीच अंतरराष्ट्रीय सीमा है। किन्नौर के लिये पहले इनर-लाइन परमिट लेना होता था पर अब लगभग सारा किन्नौर (शिपकी-ला, कौरिक जैसे इलाकों को छोङकर) आम भारतीय नागरिकों के लिये बिना परमिट के खुला हुआ है, इस हद तक कि तिब्बत के इलाके तक बिना दूरबीन के साफ दिख जायें। हिन्दुस्तान-तिब्बत रोड (NH-22) के अंतिम छोर “खाब” तक भी आप जा सकते हैं। रिकांगपिओ और कल्पा किन्नौर के दिल हैं और ये एक तरह से दो संस्कृतियों का जंक्शन भी हैं। यहां से काज़ा को बढते हुये इलाका बौद्ध बहुल होने लगता है तो शिमला की ओर बढते हुये हिन्दू बहुल। रिकांगपिओ और कल्पा में हिन्दू और बौद्ध दोनों ही धर्म एक साथ श्वास लेते हैं। आज की सुबह मैं कल्पा में हूँ यानि किन्नौर की खूबसूरती के गढ में। अन्य जगहों की तरह रविन्द्र बार-बार इसका नाम भी भूल जाता था और कल्पा की बजाय कल्पना-कल्पना जपने लगता था। जो वहां नहीं गऐ वो बस कल्पा की सुंदरता की कल्पना ही कर सकते हैं। कल्पा में ताबो जितनी पुरानी पर उससे कम प्रसिद्ध हू-बू-लान-कार मोनेस्ट्री है और नारायण-नागनी मंदिर के रूप में स्थानीय शिल्प-कौशल का नमूना भी है। सेब और आङू के बेइंतहा बाग तो हैं ही। जिधर देखो सेब ही सेब। चिलगोजे और अखरोट भी हैं। दिल्ली से रिकांगपिओ की दूरी साढे पाँच सौ किलोमीटर के लगभग है और दोनों शहरों के बीच सीधी बस सेवा है। रिकांगपिओ से कल्पा दस किलोमीटर भी नहीं है।

हिमाचल मोटरसाईकिल यात्रा (नारकंडा से कल्पा) भाग-02

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बंजारा हूँ, मैं कहां बस्ती में रहता हूँ।
आवारा झोंका हूँ, अपनी मस्ती में रहता हूँ।
हिमाचल मोटरसाईकिल यात्रा का आज मेरा ये दूसरा दिन है। कल जब नारकंडा पहुँचा था तो मौसम खराब होने लगा था इसलिऐ यहीं रूक गया। फिर दिन ढले झमाझम बारिश भी खूब हुई। दोपहर बाद हिमालय में बारिश हो जाना कोई असामान्य बात है भी नहीं। सो ये सोचकर कि सुबह मौसम खुला हुआ मिलना ही है, आराम से सोये। लगातार 15 घंटे की बाईक-राइडिंग किसी को भी थका सकती है। मुझे भी थकाया। नतीजा ये हुआ कि आज नारकंडा से तैयार होकर निकलने में 10 बज गये। लंबी यात्राओं में समय महत्वपूर्ण होता है और हमने कम से कम तीन घंटे का वक्त जाया कर दिया। खैर बाईक के पास आये और अपना सामान बांधा। इसके बाद कुछ समय नारकंडा के आसपास के नजारे में लेने लग गया।

नारकंडा हिमालय की शिवालिक रेंज में करीब 2730 मीटर की उंचाई पर है। जाहिर है मौसम में ठंडक घुली रहती है। रजाईयों की जरूरत बनी रहती है। गर्म जॉकेट पहनने पर भी सितंबर की दस बजे की धूप बङी गुनगुनी लग रही थी। हिन्दुस्तान-तिब्बत रोड नारकंडा के बीच से गुजरता है। यह रामपुर-बुशैहर और शिमला के ठीक बीच में स्थित है। दोनों शहर इससे करीब 65-65 किलोमीटर आगे-पीछे हैं। मुख्य कस्बे के दक्षिण-पूर्व में है हाटू चोटी। 3000 मीटर से अधिक उंचाई वाली यह चोटी स्थानियों के लिये काफी पवित्र है। इस पर एक मंदिर भी बना हुआ है। कोई निजी होटल तो नहीं है, हां लेकिन एक सरकारी रेस्ट-हाऊस अवश्य है। नारकंडा कस्बे से करीब आठ किलोमीटर की चढाई के बाद वहां पहुँच सकते हैं। चाहे तो ट्रेकिंग कर सकते हैं या फिर अपने वाहन से भी जा सकते हैं। सङक उपर तक गई है। मौसम खराब ना हो तो अपना टैंट भी लगा सकते है। उत्तर-पूर्व की ओर देखने पर आपको कोटगढ के सेब के बाग आसानी से दिख जायेंगें। अच्छी क्वालिटी के सेब बहुत होते हैं यहां। सत्यानन्द स्टॉक्स (सैमुअल इवान स्टॉक्स) एक अमरीकी थे जिन्होंने इस क्षेत्र की अर्थव्यवसथा को सुधारने के लिये यहां सेबों की खेती आरंभ की थी। कोटगढ और थानाधार की दूरी नारकंडा से ज्यादा नहीं है। थानाधार भी एक सुंदर जगह है। एक झील भी है इसके आस-पास पर अब उसका नाम याद नहीं आ रहा। नारकंडा में एक पैट्रोल-पंप भी है। इसके बाद पैट्रोल-पंप रामपुर में ही मिलता है। नारकंडा से श्रीखंड महादेव भी साफ दिखाई देता है। उत्तर-पश्चिम दिशा की ओर देखने पर यदि मौसम साफ हो तो श्रीखंड महादेव और कार्तिकेय चोटियां पहाङों की अंतिम कतार में खङी दिखाई देती हैं।

पिंजौर गार्डन (हिमाचल मोटरसाईकिल यात्रा, भाग-01)

फूलों की घाटी का कार्यक्रम रद्द हो जाने की वजह से मन बहुत दुःखी हो गया था। कई कोशिशें करने के बावजूद उत्तराखंड यात्रा बार-बार टल रही थी। इस बार तो ऐन मौके पर जाना रद्द हुआ, बैग तक आधे पैक हो गऐ थे और फिर से उत्तराखंड यात्रा टल गई। मैं खीज गया। तेरी ऐसी की तैसी। एक तू ही है क्या भारत में? उत्तराखंड, अब आऊंगा ही नहीं तेरे यहां। कहीं और चला जाऊंगा। पङा रह अपनी मरोङ में। फटाफट हिमाचल का प्रोग्राम बना डाला। हिमाचल की कई जगहें मेरी टारगेट-लिस्ट में शामिल थीं। शिपकी-ला, किब्बर, प्राचीन हिन्दुस्तान-तिब्बत रोड, एन.एच. 05, काज़ा आदि। कुछ बौद्ध मठों को भी साथ में देखने का कार्यक्रम बनाया और एक लंबी दूरी की मोटरसाईकिल यात्रा फिक्स हो गई।

यात्रा-प्रोग्राम

तय कार्यक्रम की एक झलक नीचे दिखा रहा हूँ।
पहला दिनः पिंजौर गार्डन देखते हुये शिमला तक और आगे प्राचीन हिन्दुस्तान-तिब्बत रोड से होते हुये रामपुर तक।
दूसरा दिनः कल्पा, रोघी देखते हुये सांगला घाटी और छितकुल तक।
तीसरा दिनः शिपकी-ला देखते हुये दुर्गमतम एन.एच. 05 से होते हुये गियू, नाको, धनकर और ताबो मठ घूमकर काजा तक।
चौथा दिनः किब्बर और कीह देखते हुये कुंजम पास, चंद्रा घाटी और रोहतांग पास से होते हुये मनाली तक।
पांचवा दिनः दिल्ली वापस।

हुमायूं का मकबरा, बिल्कुल अलग अदांज में।

वो खाता रहा ठोकरें, जिंदगी भर सुकूं को।
ना मिल सका सुकूं, मौत के बाद भी रूह को।।

द्वितीय मुगल बादशाह “नासिरूद्दीन मुहम्मद हुमायूं” पर ये पंक्तियां सटीक बैठती हैं। इतिहास में बहुत से शासकों का जीवन लङाईयों में बीता है पर इस शासक का जीवन लङाईयों के साथ-साथ बेहद लंबे सफरों में भी बीता। काबुल में जन्म के बाद हुमायूं हजारों किलोमीटरों दूर दिल्ली आया। 23 साल की उम्र में पिता बाबर का साया सिर से उठ जाने के बाद 1531 में हुमायूं को गद्दी संभालनी पङी। नौ वर्षों तक शासन किया लेकिन 1540 में जब शेरशाह सूरी के हाथों मात खानी पङी तो फिर से सफर का जो सिलसिला शुरू हुआ तो लगातार पंद्रह सालों तक चलता रहा। वो दिल्ली से अफगानिस्तान होता हुआ फारस गया। वर्षों तक सेना और सहयोगी इकठ्ठे करता रहा ताकि फिर से अपना राज पा सके। जब लौटा तो उसके साथ थी कुलीन फारसी सेवकवृंदों और लङाकों की पूरी फौज। फारस में बिताऐ गऐ वे पंद्रह वर्ष न केवल हुमायूं के जिंदगी में बल्कि उसकी मौत के बाद बनने वाले मकबरे के लिऐ भी अति महत्वपूर्ण सिद्ध हुऐ। फारसी संस्कृति का असर हुमायूं और उसके बाद के काल के हिंदुस्तान पर साफ-साफ दिखता भी है। दर-दर की ठोकरें खाऐ इस शंहशाह ने दिल्ली लौट कर राज की बाजी तो जीत ली पर केवल साल-भर ही हुकूमत कर पाया। 1556 में सीढीयों से गिरकर हुमायूं की मौत हो गई। उसे दिल्ली में पुराना किला में दफनाया गया। सफर के जिन्न ने मरहूम बादशाह का पीछा मरने के बाद भी नहीं छोङा। हेमू ने जब दिल्ली पर हमला किया तो मुगलों के पैर उखङ गऐ और भागती हुई मुगल सेना को हुमायूं का शव वापस खोद निकालना पङा। उन्हें डर था कि कहीं हेमू उसे नेस्तनाबूद ना कर दे। शव को सरहिंद ले जाकर दफन किया गया। सफर यहीं नहीं रूका। हुमायूं के हरम की एक बेगम थी- हमीदा। हमीदा बेगम का हुमायूं की जिंदगी में वही स्थान था जो उसके परपोते शाहजहां की जिंदगी में मुमताज बेगम का रहा। हमीदा बेगम फारस के वनवास के पहले, दौरान और बाद में उसी तरह हुमायूं के साथ रही थी जैसे मुमताज जंगों और सफरों के दौरान शाहजहां के साथ। फर्क बस इतना है कि शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज की कब्र के लिऐ ताजमहल का निर्माण* कराया तो हमीदा ने अपने शौहर हुमायूं के लिऐ उसी ताज के प्रेरक मकबरे का। हां बाद में इन दोनों को ही उनके शरीक-ए-हय़ात के साथ ही दफन किया गया। हमीदा की मुहब्बत का ही असर रहा कि हुमायूं को पंजाब की एक गुमनाम-सी जगह के हवाले नहीं छोङ दिया गया बल्कि दिल्ली में उसके लिऐ एक आलीशान मकबरे का निर्माण कराया गया। हेरात से विशेष कारीगर बुलाये गये इसे गढने के वास्ते। 1556 में मौत के बाद इस आखिरी और भव्य ठिकाने पर आते-आते हुमायूं को करीब दस साल लग गऐ। उसे तीन बार अलग-अलग जगहों पर दफनाया गया।

कहीं और कभी देखी है लाश की ऐसी खानाबदोशी। इसी बात पर उपर दो पंक्तियां लिखनी पङीं।
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